कानूनों की प्रासंगिता खत्म तो नहीं हो प्रयोग

Supreme Court sachkahoon

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 152 सालों से अंग्रेजों के समय से चले आ रहे राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कह दिया कि जब तक केंद्र सरकार इस कानून पर पुनर्विचार कर रही है, तब तक इसके तहत कोई नया मामला दर्ज करना ठीक नहीं होगा। राजद्रोह के जो मामले लंबित हैं, वे भी पुनर्विचार प्रक्रिया पूरी होने तक के लिए स्थगित कर दिए गए हैं। नि:संदेह इस कानून का दुरुपयोग होता रहा है। वास्तव में अंग्रेज हमारे लिए अपरिचित थे और जबरन शासन करने के लिए हर प्रकार की सख्ती को उचित मानते रहे। अंग्रेजों की मानसिकता और उद्देश्य भारतीयों को अपना गुलाम बनाकर रखना था। अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के विरोध को विद्रोह करार देकर अमानवीय अत्याचार किए लेकिन हमारे देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है और सरकार है। संविधान विरोध करने की अनुमति भी देता है।

वास्तव में अंग्रेजों ने हमें केवल देशद्रोह के खिलाफ ही कानून नहीं दिया बल्कि 1935 एक्ट भी हमारे संविधान पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। भले ही किसी कानून को मूल में अपनाया जाए या संशोधित कर, लेकिन बदलती परिस्थितियों के अनुसार उसमें बदलाव आवश्यक है। नि:संदेह आज भी देश विरोधी ताकतें देश को कमजोर करने के लिए बम धमाके, दंगों और अन्य तौर-तरीकों से देश को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं जिनके खिलाफ सख्त निर्णय लेने की आवश्यकता है लेकिन हमारे देश में बड़ी समस्या कानूनों के हो रहे दुरुपयोग की है। जब किसी कानून का प्रयोग विरोधियों को ठिकाने या राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा हो तब कानून देश की सुरक्षा करने की बजाय निर्दोष लोगों का उत्पीड़न करती है।

भले ही आज भी देशद्रोह के मामलों में फंसे सभी लोग निर्दोष नहीं, लेकिन यह भी वास्तविक्ता है सैकड़ों निर्दोष लोग भी फंसे हुए हैं जिन्होंने कभी लाठी तक नहीं उठाई व न ही मारी एवं हमेशा समाज व देश की भलाई में योगदान दिया है। भले ही देश आतंकवाद की समस्या का सामना कर रहा है लेकिन देशद्रोह जैसे कानून की सही तरीके से पालना अपने आप में बड़ी चुनौती है। यूं भी फांसी की सजा आज भी हमारे देश में बरकरार है और सख्त कानूनों को सिरे से नकारा नहीं जा सकता लेकिन सख्त कानूनों के पालन के लिए कोई व्यवस्था या माहौल न होने के चलते ऐसे कानूनों की आलोचना होना स्वाभाविक है। अब केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती यह है कि देश की परिस्थितियों व सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर नया रास्ता निकाला जा सकता है। विरोध और विद्रोह की बारीकी से पहचान करनी होगी।

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