1948 में नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया था स्वतंत्र भारत का पहला भाषण, दुनिया को दिया था शांति और अहिंसा का संदेश

1948 में नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया था स्वतंत्र भारत का पहला भाषण, दुनिया को दिया था शांति और अहिंसा का संदेश

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नई दिल्ली: भारत की आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की विदेश नीति और विचारधारा को दुनिया के सामने रखने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया था। 3 नवंबर 1948 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र को संबोधित किया था। इसे स्वतंत्र भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में दिए गए शुरुआती औपचारिक वक्तव्यों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

अपने संबोधन में नेहरू ने विश्व शांति, अहिंसा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उपनिवेशवाद के विरोध को भारत की विदेश नीति का प्रमुख आधार बताया था। उन्होंने दुनिया के देशों से आपसी मतभेदों को बातचीत और समझदारी के जरिए सुलझाने की अपील की थी।

विश्व शांति और अहिंसा पर दिया जोर

संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण के दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि घृणा और हिंसा के रास्ते स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए बातचीत, आपसी विश्वास और सहयोग को जरूरी बताया।

नेहरू का मानना था कि दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता और अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर में दिए गए सिद्धांतों और उद्देश्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

कश्मीर का मुद्दा भी उठा

नेहरू के इस ऐतिहासिक संबोधन में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा भी प्रमुखता से शामिल रहा। दरअसल, 1947-48 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में पहुंच चुका था।

नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का पक्ष रखते हुए इस विवाद का समाधान न्याय, बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों से निकालने पर जोर दिया। उस समय कश्मीर का मुद्दा भारत की विदेश नीति के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल था।

नवस्वतंत्र भारत की विदेश नीति का स्पष्ट संदेश

1948 में जब नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया, उस समय भारत को स्वतंत्र हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था। देश अपनी नई पहचान स्थापित करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा भी तय कर रहा था।

ऐसे समय में नेहरू का यह संबोधन काफी महत्वपूर्ण था। इसके जरिए भारत ने दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया कि उसकी विदेश नीति का आधार शांति, अहिंसा, समानता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उपनिवेशवाद का विरोध होगा।

आज भी प्रासंगिक हैं नेहरू के विचार

पंडित जवाहरलाल नेहरू का यह संबोधन स्वतंत्र भारत की शुरुआती कूटनीतिक सोच को समझने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है। विश्व शांति, संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को लेकर उनके विचार उस दौर में भारत की वैश्विक भूमिका को परिभाषित करने में सहायक बने।

इस तरह 3 नवंबर 1948 का दिन भारतीय कूटनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जब नवस्वतंत्र भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से दुनिया के सामने अपनी विदेश नीति के मूल सिद्धांतों को रखा था।

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