तुच्छ हरकतों से विरोध करना निंदनीय

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कर्नाटक में किसान नेता राकेश टिकैत के चेहरे पर सियाही फेंकने की घटना बेहद शर्मनाक व निंदनीय है। यह हमारे भारतीयों के पिछड़ेपन, असभ्य व पिछलगु सोच का परिणाम है। विगत वर्षों में कालिख पोतने की घटनाओं की शुरूआत हुई थी, अब विरोध के नाम पर यह चलन ही बन गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने से पहले एक कार्यक्रम में अरविन्द केजरीवाल के चेहरे पर सियाही फेंकी गई थी। उसके बाद कई अन्य नेताओं के साथ भी ऐसा हुआ। लोकतंत्र के दौर में यह बहुत ही घटिया हरकत है। यह बौखलाहट और कमजोर विचारधारा वाले लोगों की हरकत है जो दिमागी रूप से खाली और सोच-समझ से कोरे हैं। दरअसल, हमारे देश के लोग पिछलगू मानसिकता वाले हैं, जहां अच्छे कार्यों की प्रशंसा या अनुसरण नहीं करते और नकारात्मक कार्यों को भागकर अपना लेते हैं।

किन मुद्दों पर मतभेदों या विरोध का वैचारिक रूप से जवाब दिया जाना चाहिए, यह आज बहुत कम लोगों को मालूम है। कई वर्ष पूर्व अमेरिका के राष्ट्रपति पर भी वहां किसी ने जूता फेंका था, बस वहां से ही हमारे भारतीयों ने इस बुरी आदत को अपना लिया और जूता फेंकने को बहादुरी वाला काम समझ विरोध जताने लगे। देश के पूर्व गृह मंत्री पी. चिदम्बरम से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री और बहुत से राजनेताओं पर जूते फेंकने की घटनाएं घटीं। राजनीतिक पार्टियों ने भी भीतरी तौर पर ऐसी घटनाओं का समर्थन किया। परिस्थितियां ऐसी बन गई कि एक विधायक भी जूता फेंकने वालों में शामिल हो गया। इस तरह की विचारधारा से देश कैसे खुशहाल होगा और विकास करेगा? दूसरी ओर प्राचीन इतिहास यह रहा है कि तलवारों से युद्ध लड़ने वाले योद्धा शब्दों से तलवार की अपेक्षा ज्यादा काम ले लेते थे।

पोरस के बहादुरी भरे व बुद्धिमतापूर्ण शब्दों ने सिकंदर जैसे विजेता को भी कायल कर लिया था, ऐसे देश में बुद्धिमत्ता त्याग कालिख और जूता फेंकने का क्या औचित्य? ऐसी हरकतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और भारतीयों की छवि को छोटा बनाती हैं। अमेरिका में एक बार जूता फेंका गया लेकिन वहां दोहराया नहीं गया। दूसरी ओर हमारे देश में इसे छोड़ा ही नहीं जा रहा। किसी के भी विचार कैसा भी हों लेकिन हिंसा के लिए समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। यह भी वास्तविक्ता है कि घटिया हरकतों से अच्छाई या सच को दबाया नहीं जा सकता। विरोध करना सबका अधिकार है लेकिन इसका स्तर और ढंग सकारात्मक और सम्मानजनक हो। राजनेताओं का किसी तुच्छ घटना पर चुप रहना निहायत ही गलत है। तुच्छ किस्म की घटनाओं को अंजाम देने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो।

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