167 करोड़ की पेंटिंग और कला की असली कीमत: ‘यशोदा और कृष्ण’ ने फिर छेड़ी कला बाजार पर बहस
167 करोड़ की पेंटिंग और कला की असली कीमत: ‘यशोदा और कृष्ण’ ने फिर छेड़ी कला बाजार पर बहस
मुंबई में हुई नीलामी में महान कलाकार राजा रवि वर्मा की पेंटिंग ‘यशोदा और कृष्ण’ 168 करोड़ 20 लाख रुपये में बिकी। इस बोली के साथ उद्योगपति साइरस पूनावाला ने इसे अपने संग्रह में शामिल किया। यह इतिहास में अब तक बिकी सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग्स में से एक के रूप में दर्ज हो गई है, जिससे कला के मूल्य को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। राजा रवि वर्मा उन्नीसवीं सदी के उन चुनिंदा कलाकारों में थे, जिन्होंने भारतीय चित्रकला को एक नई दिशा दी। उनका जन्म 1848 में केरल के त्रावणकोर क्षेत्र के एक कुलीन परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें कला का वातावरण मिला और उन्होंने बहुत कम उम्र में चित्र बनाना शुरू कर दिया। आगे चलकर उन्होंने पश्चिमी आॅयल पेंटिंग तकनीक सीखी और उसे भारतीय पौराणिक विषयों के साथ इस तरह जोड़ा कि एक बिल्कुल नई शैली सामने आई। यही वजह है कि उन्हें आधुनिक भारतीय चित्रकला का अग्रदूत माना जाता है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने देवी देवताओं को पहली बार इतने मानवीय और सजीव रूप में चित्रित किया कि वे आम लोगों के करीब आ गए। उस समय उनकी पेंटिंग्स केवल राजमहलों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने 1894 में एक छपाई प्रेस स्थापित कर अपनी कृतियों की प्रतियां बनवानी शुरू कीं। इससे उनकी कला घर घर तक पहुंची। ‘यशोदा और कृष्ण’ इसी विरासत की एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है। इसमें मां यशोदा और बाल कृष्ण के बीच का एक सहज और घरेलू दृश्य है, जिसे कलाकार ने अत्यंत भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है। यह पेंटिंग उनके परिपक्व काल की है और लंबे समय तक निजी संग्रह में रही, जिसके कारण इसकी दुर्लभता और बढ़ गई।
विशेषज्ञों के अनुसार इतनी ऊंची कीमत के पीछे केवल कला का सौंदर्य नहीं, बल्कि उसकी दुर्लभता और ऐतिहासिक महत्व भी होता है। जब ऐसी कृतियां नीलामी में आती हैं तो संग्रहकर्ता उन्हें हासिल करने के लिए ऊंची बोली लगाने को तैयार रहते हैं। इस बार की बिक्री ने एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। हालांकि कला बाजार को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं। इसे एक ऐसा क्षेत्र माना जाता है जहां किसी कृति की सटीक कीमत तय करना आसान नहीं होता। इसी कारण कुछ अंतरराष्ट्रीय मामलों में इसका दुरुपयोग भी सामने आया है। जांच एजेंसियों ने कुछ मामलों में यह भी पाया है कि महंगी पेंटिंग्स का उपयोग धन को छिपाने या स्थानांतरित करने के लिए किया गया, क्योंकि उनकी कीमत को साबित करना जटिल होता है। यही कारण है कि अब कई देशों में कला बाजार को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं।
फिर भी ‘यशोदा और कृष्ण’ की यह बिक्री एक खुली और सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से हुई, जिसमें कई प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। अंतिम बोली पारदर्शी तरीके से सामने आई और खरीदार की पहचान भी स्पष्ट है। साइरस पूनावाला ने संकेत दिया है कि इस कृति को समय समय पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाएगा। कला का मूल्य केवल उसके रंगों या आकार में नहीं, बल्कि उसके इतिहास, दुर्लभता और सांस्कृतिक महत्व में निहित होता है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में अवसरों के साथ साथ चुनौतियां भी मौजूद हैं, जिन्हें समझना उतना ही आवश्यक है।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)