आर्थिक समृद्धि की बजाय खुशी को बढ़ावा मिले

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आज स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, भूटान जेसे देश अपने नागरिकों में खुशी को महत्व दे रहे हैं न कि आर्थिक समृद्धि या भौतिक संसाधनों को इक्ट्ठा करने की होड़ है। इधर भारत में किसान आत्महत्याओं का राष्टÑीय सरकार, प्रांतीय संस्थाएं व समाज विज्ञानी कोई हल नहीं खोज पाए। उस पर अब देशभर में व्यापार से जुड़े लोग परिवार को मारकर खुद आत्महत्या की राह पर चल निकले हैं, ये बेहद चिंतनीय स्थिति है। कुछ रोज पहले जयपुर में एक जेवरात कारोबारी ने परिवार सहित अपना जीवन समाप्त किया। अब पंजाब के भटिंडा में एक अन्य कारोबारी ने पहले परिवार को मारा, तत्पश्चात खुद खुदकुशी कर ली। वर्तमान दौर से सब दो चार हो रहे हैं, किसी की नौकरी चली गई, किसी का कारोबार ठप्प हो गया जिसके चलते जीवन का निर्वाह व सामाजिक सम्मान बचाए रख पाना एक व्यक्ति व परिवार के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

कोरोना लॉकडाउन में हालांकि सरकार ने 20 लाख रुपये आर्थिक पैकेज की व्यवस्था की है, बैकिंग संस्थाओं को भी कर्ज वापसी में रूक जाने व ब्याज दरें कम करने के लिए कहा परन्तु इतने सबसे किसानों-व्यापारियों, मजदूरों, प्राइवेट नौकरी करने वालों की मुश्किलें कम नहीं हो रही, क्योंकि आज देश में कोई भी व्यक्ति या परिवार सरकार के भरोसे पर नहीं रह पा रहा। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजमर्रा के खर्च ऐसे हो गए हैं कि सरकार उनकी भरपाई नहीं कर सकती। आज प्रतिस्पर्धा का युग है हर व्यक्ति एक ही जीवन स्तर पर या आर्थिक स्तर पर नहीं टिके रहना चाहता वह अपने जीवन स्तर व व्यापार को ऊंचा उठाने के लिए उम्मीद से बड़े जोखिम उठा रहा है, जिस वजह से व्यक्ति व परिवार अपने आपको या दोस्त रिश्तेदारों को वक्त ही नहीं दे पा रहे, ऐसे में जब किसी के सपने बिखर जाते हैं तब वह सीधे मौत को गले लगाने की हद तक पहुंच जाता है। वक्त आ गया कि पश्चिम की तरह भारतीय भी अब इस बात की सुनिश्चितता करें कि जीवन की खुशी क्या है, वह कैसे मिलेगी? बड़ी गाड़ियां, बड़े घर, हर वक्त कारोबार में खोए रहना, परिवार का हर वक्त घर के मुखियाओं पर ज्यादा से ज्यादा कमाने का दबाव बनाना इन आदतों को बदलना होगा।

एक मध्यम वर्गीय स्तर तक पहुंचने के लिए व्यक्ति के पास अपना मकान, गॉड़ी, स्वास्थ्य व शिक्षा के लिए बचतें हों, यह काफी होता है, लोगों को अब एक दूसरे से होड़ त्यागकर एक दूसरे से मेलजोल बढ़ाना चाहिए। समाज को जो भाई-बहन आर्थिक दौड़ में पीछे रह जाते हैं, उन्हें बराबर आने में या उनके बराबर रहने में खुशी जतानी होगी तभी परिवारों व कारोबारियों की आत्महत्याएं रूकेंगी। किसान वर्ग को भी अब खेती किसानी में बदलाव लाने होंगे, दैनिक जीवन में घरों, शादियों, कारों पर दिखावा बंद करना होगा। जीवन में स्वास्थ्य सबसे बड़ी खुशी होती है। देश, समाज, परिवारों में व्यक्ति जीवन में स्वस्थ जीवन पद्धति की बात होनी चाहिए। हर व्यक्ति रोजाना कसरत करे, दोस्तों-रिश्तेदारों से बिना औपचारिकता खुले दिल से मिले, किसी को दुख है तो उसकी सहायता का प्रयत्न करे, यही वास्तविक समुद्धि है जिसकी आज पूरे देश व समाज को जरूरत है।

 

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