प्राकृतिक संसाधनों की हो रक्षा

It's time to save nature

वायु प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है। स्विस आॅर्गनाइजेशन द्वारा तैयार वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2020 में बताया गया है कि दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के 22 शहर शामिल हैं। हमारे यहां वायु की गुणवत्ता इतनी खराब है कि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों के रोग समेत अनेक जानलेवा बीमारियों से जूझते रोगियों की तादाद दिनों-दिन बढ़ रही है़ यह इस बात का संकेत है कि प्रदूषण के मामले में देश की हालत चिंताजनक है। हमारा देश दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों की सूची में पांचवे स्थान पर है। इस सूची में पहला स्थान बांग्लादेश, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा मंगोलिया और चौथा अफगानिस्तान का है। हवा के प्रदूषित होने से इनमें घुलने वाले छोटे-छोटे कण सांस के जरिये हमारे फेफड़ों तक पहुंचते है़ं, फिर हृदय, फेफड़ों, सांस आदि रोगों में वृद्धि करते है।

देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी प्रदूषण से बहुत ज्यादा त्रस्त है। दिल्ली विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी है। गाजियाबाद तो प्रदूषण में शीर्ष स्थान पर है, जो स्वास्थ्य मानकों के लिहाज से बेहद खतरनाक है। देश के वे 22 शहर, जो विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों में शामिल हैं, वहां वायु प्रदूषण का स्तर भयावह स्तर तक पहुंच गया है। दुखद है कि इस भयावह स्थिति को देखते हुए भी सरकार मौन है़ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण पर नियंत्रण करनेवाली अन्य संस्थाएं भी इस दिशा में नाकाम साबित हुई हैं। यदि वायु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर नियंत्रण लगा होता, तो देश को इतनी भयावह स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। प्रदूषण का यह स्तर हमारी असफलता का सबूत है। वायु प्रदूषण के इतने व्यापक पैमाने पर फैलने का कारण वाहनों की दिनों-दिन बढ़ती संख्या, भवन निर्माण पर प्रतिबंध का नाकाम रहना, भवन निर्माण सामग्री का खुलआम सड़कों पर पड़े रहना और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला जहरीला धुआं है।

इसे विडंबना ही कहेंगे कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए अक्सर किसानों द्वारा पराली जलाने को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर पराली केवल 2.37 प्रतिशत प्रदूषण के लिए ही जिम्मेदार है। लॉकडाउन से उपजी परेशानियों को छोड़ दें, तो इस दौरान हमारी प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण, नदियों और वायु की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा लाभ पहुंचा है। चूंकि इस दौरान सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध थे, जिससे वायु प्रदूषण घटा और प्रकृति की हरियाली लौट आई। नदियों का जल साफ हुआ़ लॉकडाउन पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में अहम कारक साबित हुआ, लेकिन लॉकडाउन के बाद जैसे ही पाबंदियां हटीं, हर तरह के प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हो गई।

आज से 110 वर्ष पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि मानव यंत्र का गुलाम न हो़ यंत्र एक सहायक की भूमिका में हो। वर्तमान स्थिति उसके एकदम उलट है। यदि हमने अभी इसे नहीं रोका, तो बहुत जल्द हम दाने-दाने को मोहताज हो जायेंगे। समय आ गया है कि हम भौतिक संसाधनों की अंधी चाहत की ओर न दौड़ें, प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा करें क्योंकि ये सीमित हैं। विकास जब-जब मानवीय हितों के विपरीत होता है, उसका दुष्परिणाम आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक स्तर के साथ प्राकृतिक संपदा पर भी होता है। इसलिए हमारा पहला कर्तव्य है कि हम मानवहित और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा की नीतियां बनाएं।

 

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