Sahitya

Sahitya: विलासिता का दुख!

Sahitya: जब कभी भी किसी विकसित देश में उपलब्ध आम जनसुविधाओं के बारे में सुनता या पढ़ता हूं तो हृदय से हूक उठ जाती है। अब इसका अर्थ आप यह कदापि ग्रहण न करें कि मैं उनकी सुविधा-सम्पन्नता से जल उठता हूं। बिना किसी आत्म प्रवंचना के कहूं तो मुझे यह उनकी विपन्नता ही नजर […]
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हिसाब बराबर

Sahitya: दादाजी, पापा और मानी बाजार गए। मानी बोली, ‘‘पापा। भूख लगी है।’’ पापा बोले-‘‘घर जाकर खाना खाएँगे।’’ उसने पूछा, ‘‘घर कब जाएँगे?’’ दादा हँसे। बोले, ‘‘अभी तो आए हैं।’’ मानी उदास हो गई। बोली, ‘‘तेज भूख लगी है।’’ पापा समझाने लगे, ‘‘बाजार का नहीं खाते।’’ मानी ने इधर-उधर देखा। पूछा, ‘‘बाजार में बहुत कुछ […]
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कविता : राष्ट्र जीवंत

राष्ट्र जीवंत रहे दिल में अरमान है सब सुरक्षित रहें दिल में अरमान है देश ही के लिए हों सब अच्छे कर्म यह हर एक देशवासी की पहचान है। तुम ग़रीबी मिटाओगे यह वादा करो मुफ़लिसी को हराओगे वादा करो एकता तुम दिखाओगे यह वादा करो हर बुराई तुम मिटाओगे यह वादा करो गर कोई […]
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वो जलाकर बस्ती…

वो जलाकर बस्ती आशियानें की बात करते हैं, मिटाकर हाथों की लकीरें मुक्कदर की बात करते हैं। नादान थे हम चालाकियाँ समझ ही ना पाए, अपना बनाकर हमें वो गैरों की बात करते हैं। छुपाते रहें उम्र भर जिनकी गलतियों को हम, वो महफ़िल में मेरी कमियों की बात करते हैं। गर इतने ही खफा […]
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कमजोर तू नहीं, तेरा वक्त है

कमजोर तू नहीं, तेरा वक्त है, व्यर्थ में ही यों न झिझक। मुश्किलें तो वक्त के साथ बदलती हैं, इन्हीं से तो जिन्दगी संवरती है। ग्रीष्म में सूरज का भी होता है तिरस्कार, शीत में उसका ही होता हैं इन्तजार। उजियाला तो हर अंधेरी रात बाद होता है, वक्त कहां किसी के लिए ठहरता है। […]
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ग़जल : तीरो-तलवार से नहीं होता

तीरो-तलवार से नहीं होता काम हथियार से नहीं होता घाव भरता है धीरे-धीरे ही कुछ भी रफ्तार से नहीं होता खेल में भावना है ज़िंदा तो फ़र्क कुछ हार से नहीं होता सिर्फ़ नुक्सान होता है यारो लाभ तकरार से नहीं होता उसपे कल रोटियां लपेटे सब कुछ भी अख़बार से नहीं होता। -महावीर उत्तरांचली […]
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भरया रहवै भंडार

मरयादा कुल की रखै, जाण नहीं दे आण। तीन रूप नारी धरै, माँ, बेट्टी अर भाण।। बिजली पाणी मेह की, हर देखै बाट। अनदात्ता भूक्खा मरै, दुनिया करती ठाट।। जाड्डो-पालो-घाम-लू, बल्हद-खेत अर क्यार। बीज-दराती-हल-कस्सी, सब किसान का यार।। ज्यूं जवान सै सीम पै, खेत्तां रह्वै किसान। मिलकै राक्खैं देस की, आन-बान अर स्यान।। नसा करै […]
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किसान

करके मेहनत कड़ी किसान, देता सबको रोटी दान। गरमी-सरदी से कब डरता, खेतों की रखवाली करता। आँधी, वर्षा या तूफ़ान, निडर जुटा है सीना तान। मेहनत करना हमें सिखाए, सच्चाई की राह दिखाए। रहता उजले-उजले मन का, सच्चा सेवक यही वतन का। नरेन्द्र अत्री ‘संतोषी’ विश्वम्बर नगर, जीन्द अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।
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लघुकथा: आभार

हर की पैड़ी पर निरंतर बढ़ती भीड़ को देखते हुए भवगीत का ध्यान चौड़े पाट की ओर गंगा-स्नान करते भक्त पर गया तो वह भी उधर ही जा पहुंचा और घाट पर लगे एंगल को पकड़कर ज्यों ही गोता लगाने को हुआ ही कि उसके पाँव उखड़ गए। बस, फिर क्या था, बरबस ही जीवन-मृत्यु […]
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समकालीन दोहे

चलती चक्की देखकर, नहीं जागती पीर। दर्द जुलाहे का कहे, कोई नहीं कबीर।। महाकुंभ की गोद में, बच्चों सा उल्लास। सारी जनता लिख रही लहरों पर इतिहास।। गंगा के तट पर जगा, ऐसा जीवन-राग। तन तो काशी हो गया, मन हो गया प्रयोग।। अखबारों की आँख में, अफवाहों की आग, कदम-कदम पर जगता, जलियावालाबाग।। फँसी […]
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अभिनय का उपहार

उन्नीसवीं शताब्दी की घटना है। भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य था। बंगाल नील साहब के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। कलकत्ता के कुछ नवयुवकों ने इन अत्याचारों पर प्रकाश डालने के लिए एक नाटक का आयोजन किया। अन्य अतिथियों के अतिरिक्त प्रकाण्ड विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी नाटक देखने के लिए आए। नाटक में विभिन्न […]
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कबीर दास जी के दोहे

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का […]
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