Samkaleen Dohe

समकालीन दोहे

चलती चक्की देखकर, नहीं जागती पीर। दर्द जुलाहे का कहे, कोई नहीं कबीर।। महाकुंभ की गोद में, बच्चों सा उल्लास। सारी जनता लिख रही लहरों पर इतिहास।। गंगा के तट पर जगा, ऐसा जीवन-राग। तन तो काशी हो गया, मन हो गया प्रयोग।। अखबारों की आँख में, अफवाहों की आग, कदम-कदम पर जगता, जलियावालाबाग।। फँसी […]
साहित्य