सरसा। पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं किपरमात्मा कण-कण में हैं, हर इन्सान के अंदर मौजूद है। कोई ऐसी जगह नहीं जहां वो न हो। बस आदमी की ऐसी निगाह नहीं जिस कारण वह उसे देख नहीं पाता। इन्सान उस परमात्मा को देख सके इसके लिए जरूरी है कि इन आंखों में प्रभु के नाम की दवा डाले। उस दवा से ये आंखें इस काबिल हो जाती हैं, इस फानी दुनिया की तरफ से बंद होकर रूहानी दुनिया की तरफ तरक्की करती हैं और जब रूहानियत में तरक्की करती-करती ये निगाहें सतगुरू मौला की उस धुन का पीछा करती हैं तो इनका आखिरी पड़ाव जो होता है, वो प्रभु के दर्श-दीदार होते हैं।
प्रभु के दर्श-दीदार से इन्सान के तमाम दु:ख, दर्द, चिंताएं मिट जाया करती हैं, अंत:करण में सरूर और चेहरे पर नूर आता है और इन्सान परमात्मा का नाम लेता हुआ, तमाम मंजिलें पार कर जाता है, जो बेहद मुश्किल होती हैं। रूहानी मंजिलों पर चलना कोई आसान बात नहीं है। क्योंकि दसवें द्वार पर जब तक आत्मा पहुंचती नहीं, रूहानी मंडलों पर जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि आत्मा पूरे जिस्म में है। जिस हिस्से से आत्मा सिकुड़ जाती है, वो हिस्सा डैड हो जाता है। इसलिए आत्मा से बढ़कर बलवान कोई दिखने में नहीं आता।
भगवान तो आत्मा को बनाने वाला है। आत्मा ऐसी शक्ति है, जो सूरज के पास से गुजर सकती है। जब सुमिरन किया जाता है, ध्यान एकाग्र किया जाता है तो आत्मबल बढ़ता है, जैसे-जैसे आत्मबल बढ़ता जाता है आत्मा शरीर से सिमटकर दसवें द्वार तक पहुंचती है। फिर आत्मा रूहानी मंडलों पर चढ़ती है और जैसे ही दसवें द्वार में प्रवेश करती है मालिक की अनहद धुन, बांग-ए-इलाही, कलमा-ए-पाक, धुर की वाणी चलना शुरू हो जाती है। आत्मा उस धुन को जैसे ही पकड़ती है तो आत्मा का खुद का प्रकाश तीन सूरजों जितना हो जाता है। इसलिए वो आत्मा किसी भी सूरज, खंड, ब्रह्मंड के पास से पार होती चली जाती है। और सारे ब्रह्मंड को पार कर जब पारब्रह्म होती है तो निजधाम का रास्ता खुलता है।