पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर, जिन्होंने बदली थी भारतीय शास्त्रीय संगीत की तस्वीर

राजदरबार की चौखट छोड़ पहुंचे थे आम लोगों के बीच

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मुंबई। आज संगीत सीखने की इच्छा रखने वाले बच्चों और युवाओं के लिए संगीत विद्यालय, शिक्षक और मंच आसानी से उपलब्ध हैं। लेकिन एक समय ऐसा था जब भारतीय शास्त्रीय संगीत को सीमित वर्ग और राजदरबारों से जोड़कर देखा जाता था। ऐसे दौर में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने संगीत को आम समाज तक पहुंचाने और उसे सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। Entertainment News

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का जन्म 18 अगस्त 1872 को महाराष्ट्र के कुरुंदवाड़ में हुआ था। उनके पिता पंडित दिगंबर गोपाल पलुस्कर प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। घर में भजन और कीर्तन का वातावरण होने के कारण बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर हो गया। बचपन में एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी को प्रभावित किया। दत्त जयंती के दौरान पटाखे से उनके चेहरे और आंखों को गंभीर चोट लगी और कुछ समय के लिए उनकी दृष्टि चली गई। बाद में उनकी आंखों की रोशनी वापस आई, लेकिन इस घटना के बाद उनका जीवन संगीत की दिशा में आगे बढ़ता गया।

उनकी संगीत प्रतिभा को पहचानते हुए मिरज के तत्कालीन शासक ने उन्हें प्रसिद्ध संगीतज्ञ बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर के पास प्रशिक्षण के लिए भेजा। पलुस्कर ने लंबे समय तक गुरु के सान्निध्य में रहकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखीं। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की यात्राएं कीं। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों और रियासतों की संगीत परंपराओं को करीब से समझा।

दरबारी गायक बनने के प्रस्ताव को किया अस्वीकार

उस समय किसी प्रतिष्ठित संगीतज्ञ के लिए राजदरबार में स्थान मिलना सम्मान की बात मानी जाती थी। पलुस्कर को भी दरबारी गायक बनने के अवसर मिले। लेकिन उनका उद्देश्य केवल किसी राजदरबार तक सीमित रहना नहीं था। उनकी सोच थी कि संगीत किसी विशेष वर्ग की संपत्ति नहीं होना चाहिए। वह चाहते थे कि सामान्य परिवारों के बच्चे और समाज के अधिक से अधिक लोग भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखें और उसकी सुंदरता को समझें। Entertainment News

पलुस्कर ने संगीत को सीमित दायरे से बाहर निकालने के लिए सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रस्तुतियां देना शुरू किया। उन्होंने लोगों को संगीत से जोड़ने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जिनमें आम लोग भी शामिल हो सकते थे। उनका मानना था कि संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व और आत्मिक विकास से जुड़ी साधना है।

1901 में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना

संगीत शिक्षा को व्यापक बनाने की दिशा में उनका सबसे महत्वपूर्ण कदम 5 मई 1901 को लाहौर में गांधर्व महाविद्यालय की स्थापना था। इस संस्थान ने भारतीय संगीत शिक्षा के क्षेत्र में नई दिशा तैयार की। यहां संगीत सीखने के लिए किसी विशेष परिवार या सामाजिक पृष्ठभूमि से होना आवश्यक नहीं माना गया। पलुस्कर ने संगीत शिक्षा के दरवाजे अधिक से अधिक लोगों के लिए खोलने का प्रयास किया।

गांधर्व महाविद्यालय चलाना पलुस्कर के लिए आसान नहीं था। संस्थान की व्यवस्था के लिए उन्हें स्वयं आर्थिक संसाधन जुटाने पड़े। कई कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा। उनकी सोच केवल बड़े गायक तैयार करने तक सीमित नहीं थी। वह ऐसे श्रोताओं का निर्माण करना चाहते थे जो अच्छे संगीत को पहचान सकें और उसकी गहराई को समझ सकें। इसी विचार से जुड़ी उनकी चर्चित उक्ति 'तानसेन नहीं, कानसेन' के रूप में याद की जाती है।

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को भी मिला अवसर

पलुस्कर ने आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे विद्यार्थियों को भी संगीत सीखने का अवसर देने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य था कि संगीत शिक्षा केवल संपन्न लोगों तक सीमित न रहे। उन्होंने विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के साथ उन्हें भविष्य में इसी क्षेत्र के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी तैयार किया। Entertainment News

बाद के वर्षों में गांधर्व महाविद्यालय को लाहौर से मुंबई स्थानांतरित किया गया। संस्थान के लिए भवन और विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था करने में पलुस्कर को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इसके लिए कर्ज भी लिया और उसे चुकाने के लिए लगातार सार्वजनिक कार्यक्रम किए। हालात यहां तक पहुंचे कि 1924 में उनकी संपत्ति और संस्थान नीलामी की स्थिति में आ गए, लेकिन आर्थिक संकट उनकी संगीत साधना और विचारों को समाप्त नहीं कर सका।

शिष्यों ने आगे बढ़ाई संगीत की विरासत

पलुस्कर ने स्वयं संगीत शिक्षा देने के साथ कई प्रतिभाशाली शिष्य तैयार किए। विनायकराव पटवर्धन, ओंकारनाथ ठाकुर, नारायणराव व्यास और बी.आर. देवधर जैसे उनके शिष्य आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्वपूर्ण नाम बने। उनके पुत्र दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर भी प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक के रूप में पहचाने गए। पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने संगीत शिक्षा से जुड़े कई ग्रंथों की रचना की। उनके तीन खंडों में प्रकाशित 'संगीत बाल प्रकाश' सहित राग और संगीत से संबंधित उनके लेखन को संगीत शिक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर का निधन 21 अगस्त 1931 को हुआ। वह उस समय 59 वर्ष के थे। उनका जीवन भले ही समाप्त हो गया, लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाने का उनका प्रयास आगे भी जारी रहा। उन्होंने संगीत को राजदरबारों और सीमित वर्ग की परंपरा से निकालकर व्यापक समाज तक पहुंचाने की जो नींव रखी, उसने भारत में संगीत शिक्षा के विस्तार को नई दिशा दी। Entertainment News

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