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Sawan Festival: मीठी तो कर दे री मां कोथली, आया सै सामण का त्यौहार...
हरियाणा में आज भी जीवंत है 'कोथली' की परंपरा
Sawan Kothli: कैथल, (सच कहूँ/कुलदीप नैन)। मीठी तो कर दे री मां कोथली, आया सै सामण का त्यौहार... जी हां! कुछ इसी तरह के लोक गीतों से, हरियाणा में सामण के महीने की शुरूआत होती। सावन की हरियाली के साथ ही प्रदेश में 'कोथली' की परंपरा भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है। विवाहित बेटियों को उनके मायके की ओर से सावन के इस महीने में कोथली भेजी जाती है। समय के साथ जीवनशैली में बदलाव जरूर आया है, लेकिन हरियाणा की यह पारंपरिक रस्म आज भी परिवारों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम कर रही है। Sawan Festival
तीज की कोथली केवल उपहारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि मायके के स्नेह, अपनत्व और रिश्तों की मिठास का प्रतीक मानी जाती है। हरियाणा में सावन लगते ही विवाहित महिलाओं की नजरें अपने पीहर से आने वाली कोथली पर टिक जाती हैं। परंपरा के अनुसार मायके से बेटी के साथ-साथ उसके ससुराल के सदस्यों के लिए भी कपड़े, मौसमी फल, मिठाइयां और अन्य उपहार भेजे जाते हैं। कोथली में विशेष रूप से घेवर, फिरनी, आटे के बिस्कुट, बताशे, मठरी (मट्ठी) तथा अन्य पारंपरिक मिठाइयां शामिल होती हैं। पुराने समय में महिलाएं अपनी बेटी की कोथली में सवाहली और गुलगुले भी उतारकर भेजती थी।
हरियाणा की लोक परंपरा के अनुसार विवाह के बाद पहली तीज नवविवाहिता अपने मायके में मनाती है। इस दौरान ससुराल की ओर से उसके लिए 'सिंधारा' भेजा जाता है, जिसमें मिठाई, वस्त्र, श्रृंगार का सामान और अन्य उपहार शामिल होते हैं। वहीं पहली सावन में बेटी का मायके आना भी शुभ माना जाता है। इसके बाद हर वर्ष सावन शुरू होते ही बेटियां अपने पीहर से आने वाली कोथली का बेसब्री से इंतजार करती हैं। Sawan Festival
पुंडरी की फिरनी की चर्चा विदेशों में भी
कैथल जिले के पुंडरी हल्के की फिरनी देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी "पूंडरी की फिरनी" के नाम से प्रसिद्ध है। अपनी इसी प्रसिद्धि के चलते पूरे हरियाणा में हर वर्ष पूंडरी की फिरनी सबसे ज्यादा बिकती है। 1936 में फिरनी बनाने की शुरूआत कस्बे के गांव फतेहपुर से संबंध रखने वाले स्व. हरिकिशन ब्यास ने 1936 में फिरनी बनाने की शुरूआत की थी। गांव के बीच में छोटी सी दुकान से उन्होंने फिरनी बनाने का काम शुरू किया था, जो धीरे-धीरे आगे चलकर पूरे देश में मशहूर हो गई। कहा जाता है कि उस वक्त हरिकिशन ब्यास अकेले थे, जो फिरनी बनाने का काम करते थे। अंग्रेज अधिकारी भी उनकी बनाई फिरनी के दीवाने थे। Sawan Festival