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Responsible Journalism: पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जिम्मेदारी: डिजिटल युग की चुनौतियां और समाधान
न्यायालय की टिप्पणी: बदलते संचार युग में पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा आवश्यक
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सही दिशा देना, जनहित के मुद्दों को सामने लाना और सत्ता के हर स्वरूप को जवाबदेह बनाना रहा है। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कामकाज पर नजर रखते हुए समाज की आवाज बनती है। यह केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने का महत्वपूर्ण साधन है। हिंदी पत्रकारिता ने दो सौ वर्ष से अधिक की यात्रा पूरी कर ली है। ऐसे समय में पत्रकारिता जगत को अपने मूल उद्देश्यों और जिम्मेदारियों पर गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता है। Responsible Journalism
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की टिप्पणी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि मोबाइल और माइक लेकर घूमने वाला हर व्यक्ति स्वयं को पत्रकार बताने लगा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन इसके नाम पर डराने, धमकाने या गैरजिम्मेदार व्यवहार को स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश की यह चिंता वर्तमान समय की वास्तविक चुनौती को सामने रखती है।
मोबाइल और इंटरनेट ने सूचना के प्रसार को बहुत तेज कर दिया है। इसके सकारात्मक पक्ष भी हैं। जनहित से जुड़ी सूचनाएं तेजी से लोगों तक पहुंचती हैं और समाज को जागरूक बनाने में मदद मिलती है। लेकिन दूसरी ओर ऐसी सामग्री भी तेजी से फैलती है, जो समाज में तनाव, भ्रम और भय पैदा करती है। लगातार नकारात्मक खबरों की अधिकता लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। हिंसा, अपराध और विवाद से जुड़ी सूचनाओं को अधिक महत्व मिलने से समाज में चिंता और अविश्वास का वातावरण बढ़ रहा है। Responsible Journalism
डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ नए प्रकार के अपराध भी सामने आए हैं। साइबर ठगी, फर्जी पहचान बनाकर धोखा देना और डिजिटल माध्यम से लोगों को भयभीत कर धन ऐंठना जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। कई मामलों में अपराधी झूठे आरोप लगाकर लोगों को डराते हैं और उनकी निजी जानकारी का दुरुपयोग करते हैं। इसी तरह कुछ लोग पत्रकारिता के नाम पर खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर लोगों पर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
भारत में पत्रकारिता का इतिहास संघर्ष और त्याग से भरा रहा है। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए इंडियन ओपिनियन का प्रकाशन किया। बाद में यंग इंडिया, हरिजन और नवजीवन जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक परिवर्तन का संदेश दिया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने मूकनायक और लोकमान्य तिलक ने केसरी के माध्यम से जनजागरण का कार्य किया। 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड शुरू किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारों ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य किया।
आज संचार के साधन पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। रेडियो, समाचार पत्र, दूरदर्शन और इंटरनेट के बाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी हमारे जीवन का हिस्सा बन रही है। इससे कई सुविधाएं मिली हैं, लेकिन इसके गलत उपयोग से नई चिंताएं भी पैदा हुई हैं। किसी व्यक्ति की तस्वीर या आवाज में बदलाव कर भ्रामक सामग्री तैयार करना आसान हो गया है। इससे निजता, विश्वास और सामाजिक संबंधों पर असर पड़ रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता कई उपयोगी कार्य कर सकती है। यह आवेदन तैयार करने, जानकारी जुटाने और काम को सरल बनाने में सहायता कर सकती है। लेकिन यह समाज की संवेदनाओं, संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्यों को पूरी तरह नहीं समझ सकती। इसलिए इसका उपयोग जिम्मेदारी और सावधानी के साथ किया जाना जरूरी है।
भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता समाज को नुकसान पहुंचाने, झूठ फैलाने या किसी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं देती। पत्रकारिता की असली शक्ति उसकी विश्वसनीयता और जिम्मेदारी में है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता के नाम पर होने वाले गलत कार्यों पर नियंत्रण हो और वास्तविक पत्रकारिता के मूल्यों को मजबूत किया जाए। न्यायालय की टिप्पणी इसी दिशा में आत्ममंथन का अवसर देती है। Responsible Journalism
अरुण कुमार दीक्षित (यह लेखक के अपने विचार हैं)।