पार्टी ‘विभीषणों’ के राजनीतिक भंवर में फंसकर रह गए प्रदीप चौधरी

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कैराना (संदीप इन्सां)। कैराना लोकसभा से भाजपा प्रत्याशी प्रदीप चौधरी पार्टी ‘विभीषणों’ के राजनीतिक भंवर में फंसकर रह गए। राजनीतिक महत्वकांक्षा के चलते पार्टी के कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने उनकी चुनावी नैया में छेद करने का कार्य किया। नतीजन, प्रदीप चौधरी को 69,216 मतों की भारी शिकस्त झेलनी पड़ी। मंगलवार को कैराना लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र की मतगणना जिला मुख्यालय के नवीन मंडी स्थल पर सकुशल सम्पन्न हो गई, जिसमें समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी चौधरी इकरा हसन ने अपने प्रतिद्वंदी भाजपा उम्मीदवार प्रदीप चौधरी को 69,216 मतों से पराजित करके जीत हासिल की। इकरा हसन को कुल 5,28,013 वोट प्राप्त हुए, जबकि प्रदीप चौधरी 4,58,897 मतों पर सिमट गए। प्रदीप चौधरी को हार के द्वार तक पहुंचाने में उनकी पार्टी से जुड़े कुछ क्षेत्रीय नेताओं का कम योगदान नही रहा। इन नेताओं ने अपने प्रभाव के इलाके में भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ खूब प्रचार किया।

यहीं नही, लोगो को विपक्षी प्रत्याशी के समर्थन में वोट करने के लिए भी प्रेरित किया। आखिकार, राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरी करने के लिए उनके द्वारा किये गए प्रयास सफल हो गए। इन नेताओं ने पार्टी के प्रत्याशी की चुनावी नैया के पतवार बनने की बजाय उसमें छेद करने का कार्य किया, जिसके चलते प्रदीप चौधरी पार्टी के ‘भितरघातियों’ के राजनीतिक भंवर में फंसकर रह गए। नतीजा, उन्हें चुनाव में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। पार्टी भितरघातियों के कारनामा पूरी तरह जग जाहिर है, जिसके बारे में चुनावी परिणाम के बाद क्षेत्रीय लोग खूब चर्चा कर रहे है। ऐसे में सवाल उठता है कि संगठन का शीर्ष नेतृत्व क्या पार्टी प्रत्याशी को पराजय के दावानल में धकेलने वाले इन ‘विभीषणों’ के विरुद्ध भी कोई सख्त निर्णय लेगा? अगर ऐसा नही हुआ तो ये लोग स्वयं को पार्टी से ऊपर समझकर भविष्य में भी इस तरह के पार्टी विरोधी कृत्यों को अंजाम देते रहेंगे। हालांकि बताया जा रहा है कि पार्टी हाई कमान तक चुनाव में बगावत करने वाले ऐसे लोगो की पूरी फेहरिस्त पहुंच चुकी है, जिस पर निकट भविष्य में संगठन की अनुशासनात्मक समिति द्वारा कठोर निर्णय लिए जाने की संभावना है।

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क्षेत्र में सक्रिय न रह पाना भी रही हार की प्रमुख वजह

निवर्तमान सांसद प्रदीप चौधरी के क्षेत्र में सक्रिय न रहने को लेकर भी अक्सर विरोध के स्वर उठते रहे है। क्षेत्र के हिन्दू गुर्जर बाहुल्य कण्डेला, हिंगोखेड़ी, शेखूपुरा, जगनपुर, ऊँचागांव, बीनड़ा, बुच्चाखेड़ी, सहपत आदि गांवों में शादी-विवाह अथवा अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल न होने को लेकर भी सांसद के प्रति लोगो में गहरी नाराजगी रही है, जिसे लेकर इन गांवों के युवा सोशल मीडिया के जरिये अपनी कड़वाहट को चुनाव से पूर्व व्यक्त कर चुके थे। इन सबके बावजूद सांसद द्वारा लोगो के अंतर्मन में बने मनमुटाव को दूर करने की कोई खास कोई कोशिश नही की गई, जिस कारण क्षेत्र के युवाओं ने मतदान में कोई खास रुचि नही दिखाई। सांसद के क्षेत्रीय प्रतिनिधियों ने भी उन्हें हमेशा गुमराह करके रखा। उन्हें वास्तविक स्थिति का आभास नही होने दिया गया। नतीजन, भाजपा सांसद को चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

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