भिंडी की फसल में भंगरी रोग: खतरे की घंटी और किसानों के लिए कारगर निदान

भिंडी की फसल पर ‘भंगरी’ बीमारी का हमला, किसानों की बढ़ी चिंता

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डॉ. संदीप सिंहमार। Bhindi ki Kheti: हरियाणा सहित उत्तर भारत के किसान अब पारंपरिक अनाज की खेती से तौबा कर फल-सब्जी उत्पादन की ओर रुख कर रहे हैं। भिंडी जैसी नकदी वाली फसलें अच्छा मुनाफा देती हैं, लेकिन इनमें कीट-रोगों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। इन दिनों भिंडी की फसलों में 'भंगरी' नामक बीमारी ने किसानों को परेशान कर दिया है। वैज्ञानिक भाषा में इसे येलो वेन मोजैक वायरस कहा जाता है। 

यह वायरल रोग फसल को बर्बाद कर देता है, जिससे उपज में 50-90 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। पानीपत, करनाल और सोनीपत जैसे जिलों के किसान इसकी चपेट में हैं, जहां भिंडी की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अगर समय रहते सावधानी न बरती गई, तो यह आर्थिक तबाही ला सकता है। भंगरी रोग एक खतरनाक वायरल संक्रमण है, जो भिंडी के पौधों को जड़ से कमजोर कर देता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी मुख्य रूप से व्हाइट फ्लाई (बेनिसिया टैबेसी) नामक सफेद मक्खी के माध्यम से फैलती है। यह छोटा सा कीट पौधे का रस चूसता है और वायरस को एक पौधे से दूसरे तक पहुंचा देता है। गर्मी और नमी भरी जलवायु में यह कीट तेजी से पनपता है।

इसके अलावा, संक्रमित बीज, खरपतवार और आसपास की अन्य सब्जी फसलें जैसे भिंडी के बाद लगी टमाटर या चचिंडा भी रोग के वाहक बन जाती हैं। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के पौधा रोग विशेषज्ञ के मुताबिक यह वायरस पौधे की कोशिकाओं में घुसकर क्लोरोफिल उत्पादन रोक देता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण बाधित हो जाता है। नतीजा- पौधा कमजोर पड़ जाता है और फलन क्षमता घट जाती है।

शुरूआती लक्षण पहचानें

इस रोग के शुरूआती लक्षण आसानी से पहचाने जा सकते हैं। पौधे के निचले पत्ते सबसे पहले प्रभावित होते हैं। वे हल्के पीले रंग के हो जाते हैं और उनमें धारियां उभर आती हैं। नसें चमकीली पीली दिखाई देती हैं, जबकि पत्ती का बाकी हिस्सा हरा रहता है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, पत्तियां मुरझा जाती हैं और कुरकुरी हो जाती हैं। पौधे की बढ़ोतरी रुक जाती है, डंठल पतले हो जाते हैं और फल छोटे, टेढ़े-मेढ़े तथा कम गुणवत्ता वाले बनते हैं। गंभीर मामलों में पूरा पौधा सूख जाता है। किसान भाई ध्यान दें, अगर खेत में 10-15 प्रतिशत पौधे प्रभावित हो जाएं, तो तुरंत कार्रवाई करें। देरी से उपज का 70 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है।

पूरी तरह खत्म करना मुश्किल, पर सावधानी से किया जा सकता है उपचार

चूंकि यह वायरल रोग है, इसलिए इसे पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है। रसायनों से वायरस मरता नहीं, बल्कि वाहक कीट को नियंत्रित करना पड़ता है। रोकथाम ही सबसे बड़ा निदान है। सबसे पहले, प्रमाणित और रोगमुक्त बीज चुनें। हरियाणा के किसान सरकारी कृषि केंद्रों से उपलब्ध हाइब्रिड किस्में जैसे आर्का अनामिका, परमनी या को-402 चुन सकते हैं, जो इस रोग के प्रति सहनशील हैं। बुवाई से पहले बीज को इमिडाक्लोप्रिड के 3 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। खेत की सफाई पर जोर दें- संक्रमित पौधों को उखाड़कर जला दें। खरपतवारों को नष्ट करें, क्योंकि वे व्हाइट फ्लाई को आश्रय देते हैं।

एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाएं

कीट नियंत्रण के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाएं। जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए नीम आधारित उत्पाद सबसे सुरक्षित हैं। नीम तेल (0.5 प्रतिशत) या नीम साबुन का 300 लीटर पानी में घोल बनाकर सप्ताह में दो बार छिड़काव करें। इससे व्हाइट फ्लाई का प्रजनन रुक जाता है। खेत में पीले और नीले चिपचिपे ट्रैप (1 एकड़ में 50-60) लगाएं। ये ट्रैप कीटों को आकर्षित कर चिपका देते हैं। रासायनिक नियंत्रण जरूरी हो तो इमिडाक्लोप्रिड (कॉन्फिडोर 17.8 एस एल, 0.3 मिली/लीटर) या थायामेथॉक्सम (एक्टारा 25 डब्ल्यू जी, 0.2 ग्राम/लीटर) का इस्तेमाल करें। पहला छिड़काव बुवाई के 20-25 दिन बाद और दूसरा 10 दिन के अंतराल पर करें। 

दवा छिड़काव के बाद एक सप्ताह तक तोड़ाई करने से बचें

दवा छिड़काव के बाद कम से कम 7 दिन तक फल तोड़ाई न करें, क्योंकि अवशेष स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। किसानों को ऐसा करने से बचना चाहिए ताकि किसी के भी स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ना हो।

पिछले वर्ष भी हो चुका नुकसान 

भंगरी रोग ने पिछले साल हरियाणा में भिंडी उत्पादकों को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया। लेकिन सतर्कता से इसे न्यूनतम किया जा सकता है। जैविक और एकीकृत तरीकों से न केवल फसल सुरक्षित रहेगी, बल्कि बाजार में जैविक भिंडी की मांग बढ़ रही है, जो ज्यादा दाम दिलाती है। किसान भाई, बीमारी को हल्के में न लें। समय पर निगरानी और सही उपाय अपनाकर आप अपनी मेहनत का पूरा फल पा सकते हैं। स्वस्थ फसल, समृद्ध खेती-यही हमारा संकल्प हो।

Bhindi

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