वृक्ष बोल उठा! एक किसान, पेड़ और प्रकृति संरक्षण की प्रेरक कहानी

वृक्षों की छाया से जीवन का संदेश

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हमारे न्याई (पानी की बारी) वाले खेत में पाँच-छह वृक्ष लगे हुए थे। खेत में काम करने वाले लोगों के लिए इन वृक्षों की छाया अत्यंत सुखद और आरामदायक होती थी। उनमें से एक वृक्ष बहुत पुराना था। उसकी छाया इतनी घनी थी कि तपती धूप में भी उसके नीचे बैठते ही शीतलता का अनुभव होता था। जब कभी खेत में अनेक मजदूर काम करते थे, तो सभी अपने-अपने कपड़े, भोजन की पोटली और दूध का बर्तन उसकी शाखाओं पर टांग देते थे। पानी से भरा घड़ा उसकी जड़ों के पास रख देते थे, जिससे पानी ठंडा बना रहता था। Trees Importance

जब कभी लोग भोजन करने और विश्राम करने के बाद उठते, तो जीते पहलवान अक्सर कहते, ‘इस वृक्ष की छाया कितनी शीतल है। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मैं किसी जहाज में यात्रा कर रहा हूँ। धन्य हैं वे लोग जिन्होंने वृक्ष लगाए हैं।’ यह बात कई वर्षों पुरानी है। एक दिन मैं और मेरे पिता जी प्रात:काल ही खेत के लिए निकल गए। उन दिनों खेती बैलों की सहायता से की जाती थी। हमें खेत में हल चलाना था।

लगभग दो एकड़ भूमि की जुताई करनी थी। पिता जी आगे-आगे हल चला रहे थे और मैं पीछे-पीछे घास एकत्र कर रहा था। जब भोजन का समय हुआ तो मैंने देखा कि अभी तक मेरी माता जी दिखाई नहीं दे रही थीं। मुझे बहुत तेज भूख लगी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो पेट में चूहे दौड़ रहे हों। भूख के कारण आँतों में भी बेचैनी हो रही थी।

मैं बार-बार उचककर दूर तक देखता, लेकिन माता जी कहीं दिखाई नहीं देती थीं। मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज माता जी को आने में देर हो गई है। कुछ समय बाद अचानक मुझे माता जी दिखाई दीं और मुझे राहत मिली। वे सिर पर रोटियों की टोकरी और हाथ में लस्सी से भरी बाल्टी लेकर खेत की ओर आ रही थीं। खेत के एक कोने में पाँच-छह विसवे भूमि अभी शेष थी। Trees Importance

माता जी ने आवाज लगाई, ‘बिट्टू बेटा! आकर भोजन कर लो और अपने पिता जी को भी बुला लो।’ मैंने पिता जी को आवाज लगाई, ‘पिताजी, आइए भोजन कर लीजिए।’ आवाज देकर मैं वृक्ष की छाया में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद पिता जी भी वहाँ आ गए। माता जी ने हमें बाजरे की नहीं बल्कि गेहूँ और दाल से बनी स्वादिष्ट मिस्सी रोटियाँ, दही, आम का अचार और प्याज परोस दिया। साथ ही लस्सी से भरा हुआ बड़ा पीतल का गिलास भी दे दिया।

भोजन करने के बाद माता जी बोलीं, ‘लो बेटा, थोड़ा गुड़ भी खा लो, इससे शरीर में कमजोरी नहीं आएगी।’ कुछ देर वृक्ष के नीचे विश्राम करने के बाद पिता जी बोले, ‘बेटा, तुम बैलों को पानी पिला आओ। मैं थोड़ी देर और विश्राम कर लेता हूँ। इस वृक्ष की छाया के नीचे से उठने का मन ही नहीं करता।’ मैं बैलों को पानी पिलाकर वापस आ गया। उसके बाद पिता जी ने फिर से हल चलाना आरंभ कर दिया।

दो चक्कर लगाने के बाद पिता जी ने कहा, ‘बेटा, घर से कुल्हाड़ी और आरी ले आओ। इस वृक्ष की एक डाल रास्ते में बाधा डाल रही है, इसे काट देते हैं।’ मैं तुरंत घर गया और कुल्हाड़ी तथा आरी लेकर वापस आ गया। जब पिता जी ने वृक्ष पर पहला प्रहार किया तो अचानक ऐसा लगा जैसे वृक्ष बोल उठा हो- ‘बंता सिंह! रुक जाओ। यह अन्याय मत करो। तुमने ही मुझे अपने हाथों से लगाया था। बचपन में तुम मुझे पानी देकर बड़ा करते रहे हो। मैंने भी वर्षों तक तुम्हें अपनी ठंडी छाया दी है। हमारी बचपन से ही गहरी मित्रता रही है।’ मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सचमुच वृक्ष मुझसे कह रहा हो कि मैं ही वह व्यक्ति हूँ जो कुल्हाड़ी और आरी लाकर इस अनर्थ का कारण बना हूँ। पिता जी अचानक रुक गए।

वृक्ष मानो कह रहा था, ‘याद करो, हमारी कितने वर्षों पुरानी मित्रता है। तुमने मुझे अपने हाथों से लगाया, मेरा पालन-पोषण किया और मुझे विशाल वृक्ष बनाया।’ पिता जी ने कुल्हाड़ी रोक दी। जब मैंने ऊपर देखा तो वृक्ष की शाखा पर एक पक्षी का घोंसला दिखाई दिया, जिसमें छोटे-छोटे बच्चे चहचहा रहे थे। यह देखकर मैंने भी पिता जी को वृक्ष काटने से रोक दिया। पिता जी ने प्रसन्न होकर कहा, ‘बिट्टू बेटा, तुम्हें शाबाशी है। तुमने मुझे वृक्ष काटने से रोक दिया। मैं तो बहुत बड़ा पाप करने जा रहा था। कुल्हाड़ी और आरी लेकर इन्हें घर रख आओ। आज के बाद मैं कभी वृक्ष नहीं काटूँगा, बल्कि अगले वर्ष हम स्वयं पौधे लगाकर एक सुंदर बगीचा तैयार करेंगे।’ Trees Importance
-सूबेदार जसविंदर सिंह, पंधेर खेड़ी, लुधियाना

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