शिक्षा और रोजगार
Science Behind Snoring: खुद के खर्राटों से क्यों नहीं खुलती नींद? आखिर सोते समय अपनी ही आवाज क्यों नहीं सुन पाता इंसान, जानें इसके पीछे का विज्ञान
खुद के खर्राटों से क्यों नहीं खुलती नींद? आखिर सोते समय अपनी ही आवाज क्यों नहीं सुन पाता इंसान, जानें इसके पीछे का विज्ञान
Science Behind Snoring: रात में सोते समय अगर आसपास हल्की सी भी आवाज हो जाए या कोई हमारा नाम पुकार दे, तो कई बार तुरंत नींद खुल जाती है। लेकिन आपने कभी सोचा है कि जो व्यक्ति रातभर तेज आवाज में खर्राटे लेता है, उसकी नींद खुद की आवाज से क्यों नहीं टूटती? हैरानी की बात यह है कि आसपास सो रहे लोगों को उसके खर्राटों से परेशानी होती है, लेकिन खर्राटे लेने वाला व्यक्ति आराम से सोता रहता है।
आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या सोते समय हमारे कान काम करना बंद कर देते हैं या फिर दिमाग खुद की आवाज को पहचानकर नजरअंदाज कर देता है? दरअसल, इसके पीछे हमारे मस्तिष्क की काम करने की एक दिलचस्प प्रक्रिया है। आइए जानते हैं कि विज्ञान इस बारे में क्या कहता है।
दिमाग का खास फिल्टर सिस्टम करता है आवाजों की पहचान
सोते समय भी हमारे कान आसपास की आवाजों को महसूस करते रहते हैं। हालांकि, नींद के दौरान दिमाग हर आवाज पर एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं देता। वह कुछ आवाजों को प्राथमिकता देता है, जबकि दूसरी आवाजों को नजरअंदाज कर सकता है।
इस प्रक्रिया में थैलेमस (Thalamus) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह मस्तिष्क का एक हिस्सा है, जो इंद्रियों से मिलने वाले कई संकेतों को आगे पहुंचाने और उनकी प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करता है।
नींद के दौरान दिमाग आसपास होने वाली अचानक या अनजान आवाजों पर प्रतिक्रिया दे सकता है। वहीं, परिचित और लगातार होने वाली आवाजों पर उसकी प्रतिक्रिया कम हो सकती है।
खुद के खर्राटों के मामले में भी ऐसा हो सकता है। चूंकि ये आवाजें लगातार और शरीर की सांस लेने की प्रक्रिया के साथ पैदा होती हैं, इसलिए दिमाग कई बार इन्हें जगाने वाला जरूरी संकेत नहीं मानता।
सोते समय खुद के खर्राटे क्यों नहीं सुनाई देते?
इसका एक बड़ा कारण यह है कि सोते समय हमारा दिमाग बाहरी और आंतरिक आवाजों को अलग-अलग तरीके से प्रोसेस करता है।
खर्राटे सांस लेने के दौरान गले के ऊतकों में कंपन से पैदा होते हैं। ये आवाजें बार-बार एक समान तरीके से आती हैं। दिमाग नींद के दौरान ऐसी लगातार आवाजों के प्रति कम संवेदनशील हो सकता है।
इसके अलावा, नींद में आवाज सुनने की क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन किसी आवाज के कारण जागने की संभावना उसकी तीव्रता, अचानक होने, परिचित होने और नींद की अवस्था पर निर्भर करती है।
यही वजह है कि कई बार व्यक्ति अपने तेज खर्राटों के बावजूद सोता रहता है, जबकि पास में किसी चीज के गिरने या दरवाजा खुलने की आवाज से उसकी नींद टूट सकती है।
आखिर खर्राटे क्यों आते हैं? गले की मांसपेशियां हैं वजह
खर्राटे आने के पीछे मुख्य कारण सांस लेने के रास्ते में हवा का प्रवाह प्रभावित होना है।
जब हम सोते हैं, तो गले और जीभ के आसपास की मांसपेशियां रिलैक्स हो जाती हैं। कुछ लोगों में ये मांसपेशियां ज्यादा ढीली पड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने का रास्ता संकरा हो सकता है।
ऐसी स्थिति में जब हवा इस संकरे रास्ते से गुजरती है, तो गले के आसपास मौजूद मुलायम ऊतकों में कंपन होने लगता है। इसी कंपन से खर्राटों की आवाज पैदा होती है।
खर्राटे आने के कुछ सामान्य कारण ये हो सकते हैं:
सोते समय गले की मांसपेशियों का ज्यादा रिलैक्स होना।
नाक बंद होना या सांस लेने में रुकावट।
अधिक वजन होना।
पीठ के बल सोने की आदत।
शराब का सेवन या कुछ नींद लाने वाली दवाओं का प्रभाव।
क्या तेज खर्राटे लेना किसी बीमारी का संकेत है?
हर बार खर्राटे लेना किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता। लेकिन अगर कोई व्यक्ति रोजाना बहुत तेज खर्राटे लेता है और सोते समय उसकी सांस बार-बार रुकती हुई महसूस होती है, तो यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (Obstructive Sleep Apnea) का लक्षण हो सकता है।
इस समस्या में सोते समय सांस लेने का रास्ता बार-बार संकरा या बंद हो जाता है। इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलने में परेशानी हो सकती है और नींद भी प्रभावित होती है।
इसके कुछ प्रमुख लक्षण हैं:
बहुत तेज और लगातार खर्राटे आना।
सोते समय सांस रुकना या हांफकर उठना।
सुबह उठने पर सिरदर्द होना।
दिनभर नींद और थकान महसूस होना।
रात में बार-बार नींद खुलना।
अगर ये लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर स्लीप स्टडी की मदद से समस्या की जांच की जा सकती है।
Comments