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    दुश्मनों के 7 टैंक तोड़ वतन के लिए कुर्बान हो गए ‘जयभगवान’

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    …सच कहूँ शहादत को सलाम | Jai Bhagwan

    सच कहूँ मंडे स्पेशल में आज पाठकों को मातृ भूमि के लिए हंसते-हंसते मर मिटे शहीद जयभगवान (Jai Bhagwan) शर्मा की बहादुरी से रूबरू करवाते हैं। पिहोवा खंड़ के गांव दीवाना में जन्मे जयभगवान ने 1965 भारत-पाक युद्ध में दुश्मनों के टैंकों को ही नहीं तोड़ा बल्कि असला खत्म होने पर भी अपने कदम पीछे नहीं हटाएं और दुश्मनों से लड़ते-लड़ते देश के लिए कुर्बान हो गए।

    1965 के भारत-पाक युद्ध में बहादुरी देख दुश्मनों के छूटे थे पसीने

    सच कहूँ-देवीलाल बारना/कुरुक्षेत्र। भारतीय सेना में जब-जब बहादुर सैनिकों का जिक्र होगा, तब-तब गनर जयभगवान शर्मा का नाम भी लिया जाता रहेगा। जी हां, 1965 के भारत-पाक युद्ध में ऐसी ही बहादुरी दिखाई थी जयभगवान शर्मा ने। भारत-पाक युद्ध में जयभगवान की ड्यूटी दुश्मनों के टैंकों को तोड़ने की लगी थी। युद्ध के दौरान वे लगातार दुश्मनों के टैंकों को तोड़कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर रहे थे। एक दिन जब ये 7 सैनिक ड्यूटी पर तैनात थे और दुश्मनों के टैंकों को तोड़ने का कार्य कर रहे थे।

    असला खत्म होने के बाद भी पीछे नहीं हटाए कदम

    • उस दिन जयभगवान ने दुश्मनों के सात टैंकों को तोड़ दिया था, लेकिन शिविर से दूर होने के कारण उनका असला खत्म हो गया।
    • बेशक असला खत्म हो गया था, लेकिन सभी सैनिकों में देश के लिए मर-मिटने का जज्बा था।
    • इसके चलते वे बॉर्डर पर ही डटे रहे।
    • भारतीय सैनिकों से बौखलाए पाकिस्तानियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दी।
    • इस दौरान उन्होंने एक गे्रनेड से भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया।
    • यह ग्रेनेड जयभगवान व उसके साथियों को जा लगा,
    • जिससे जयभगवान व उनका एक साथी देश की रक्षा करते-करते मातृभूमि की गोद में सो गए और वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

    बचपन से ही वॉलीबाल व कबड्डी खेलने का शौक

    जयभगवान शर्मा का जन्म पिहोवा खंड़ के गांव दीवाना में पिता मुंशीराम व माता सुनहेरी देवी के घर हुआ। वे 7 भाईयों में से मदन लाल व जयनारायण से छोटे और कृष्ण, सावण सिंह, सुखदेव व मिलक राज से बडेÞ थे। उनकी दो बहने कृष्णा व सुखदेबों देवी हैं। जयभगवान के भाई कृष्ण ने बताया कि वे बचपन से ही सबसे अलग थे, लंबे-चौडेÞ शरीर व अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वे प्रसिद्ध थे।

    बचपन से ही उन्हें वॉलीबाल व कबड्डी खेलने का शौक था। उन्होंने पिहोवा के एक स्कूल में 9वीं तक की पढ़ाई पूरी की। 10 वीं में दाखिला लेने के बाद वे पिहोवा रहते हुए ही एक दिन फौज में भर्ती हो गए। भर्ती होने के बाद उन्हे नासिक में टेÑनिंग के लिए भेजा गया। वहां उन्हें 1196927 आर्मी नंबर दिया गया।

    सिर्फ तीन बार ही छुट्टी पर आए थे घर | Jai Bhagwan

    • उनके भाई सावण सिंह ने बताया कि जयभगवान 1962 मे फौज में भर्ती हुए थे।
    • पहली बार वे नासिक से ट्रेनिंग पूरी कर घर छुट्टी आए थे।
    • इसके बाद वे दो बार ओर छुट्टी आए थे। जब वे दूसरी बार छुट्टी आए थे तो उन्होंने अपनी टांग पर एक घाव भी दिखाया था।
    • यह घाव उन्हें एक आतंकी मुठभेड़ में गोली लगने से हुआ था।
    • उन्होंने बताया कि जब वे तीसरी बार छुट्टी आए थे तो 1965 का युद्ध शुरु हो चुका था।
    • इसलिए वे छुट्टी खत्म होने से पहले ही ड्यूटी पर चले गए थे। इस दौरान उनकी ड्यूटी जम्मू कश्मीर थी।

    …और एक पत्र मिला जिसके बाद परिवार में छा गया मातम

    जयभगवान के भाई कृष्ण ने बताया कि जब वे तीसरी बार छुट्टी से वापिस ड्यूटी पर गए थे तो उसके लगभग 15 दिन बाद घर एक पत्र आया, जिसने सभी परिजनों के होश उड़ा दिए थे। पत्र में लिखा था कि जसवंत सिंह देश के लिए शहीद हो गए हैं। इस समाचार से पूरे गांव व परिवार में शौक की लहर दौड गई, हर आंख नम थी। हर किसी को जसवंत सिंह के शहीद होने का दु:ख था।

    लेकिन इसके साथ ही हर ग्रामीण को यह गर्व था कि उनके गांव का एक बेटा देश की सेवा करते-करते कुर्बान हुआ है। उनके शहीद होने के बाद उनके छोटे भाई सुखदेव सिंह उनकी प्रेरणा से फौज में भर्ती हो गए व वर्षों तक उन्हांने फौज में रहते हुए देश की सेवा की।

    अफसोस: नहीं है कोई याद | Jai Bhagwan

    शहीद जसवंत सिंह के परिजनों को इस बात का गम है कि जसवंत सिंह ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी है, लेकिन शहीद की याद में न तो गांव में कोई स्मारक है और न ही किसी सड़क का नाम शहीद के नाम से है। शहीद के भाई कृष्ण व सावण सिंह ने बताया कि उस समय में शहीद हुए शहीदों को जमीन अलॉट की गई थी, लेकिन शहीद जसवंत सिंह के नाम से कोई जमीन भी अलॉट नही ंकी गई है।

     

     

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