अमेरिका में 100 डॉलर की असली कीमत: भारत के ₹9,400 से कितनी अलग है वहां की खरीदारी?
अमेरिका में 100 डॉलर की असली कीमत: भारत के ₹9,400 से कितनी अलग है वहां की खरीदारी?
नई दिल्ली। महंगाई का असर आज दुनिया के लगभग हर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर दिखाई दे रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है। वहां ईंधन, परिवहन, किराना और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी चीजों की कीमतें लोगों के घरेलू बजट पर असर डाल रही हैं। ऐसे में भारत से अमेरिका को देखने वाले लोगों के लिए एक बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी के पास 100 डॉलर हों, तो वह अमेरिका में आखिर कितनी खरीदारी कर सकता है? भारतीय रुपये में देखें तो 100 डॉलर की रकम सुनने में काफी बड़ी लगती है।
उदाहरण के तौर पर अगर 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 94 रुपये मानी जाए, तो 100 डॉलर लगभग 9,400 रुपये के बराबर होते हैं। भारत में इतनी रकम से किसी परिवार की सब्जी और रोजमर्रा के राशन की खरीदारी काफी हद तक हो सकती है। लेकिन अमेरिका में यही रकम कितनी दूर तक चलती है, इसकी तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।
अमेरिका में 100 डॉलर में कितने दिन की सब्जी?
अमेरिका में अगर कोई व्यक्ति 100 डॉलर लेकर केवल ताजी सब्जियां और फल खरीदने जाए, तो खरीदारी की मात्रा और सामान की गुणवत्ता के आधार पर यह रकम करीब 3 से 5 दिन तक की जरूरत पूरी कर सकती है। खासकर बड़े सुपरमार्केट में पैक्ड, कटी हुई या पहले से तैयार सब्जियों और फलों की कीमत सामान्य सब्जियों की तुलना में अधिक हो सकती है।
इसके अलावा अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के लिए खर्च और बढ़ सकता है। अगर कोई व्यक्ति भारतीय स्वाद के मुताबिक भिंडी, करेला, हरी मिर्च, लौकी, बैंगन या दूसरी देसी सब्जियां खरीदना चाहता है, तो इन्हें इंडियन ग्रोसरी स्टोर से खरीदने पर स्थानीय सामान्य सब्जियों की तुलना में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
सिर्फ सब्जियां नहीं, पूरा राशन जोड़ें तो क्या होगा?
अब अगर 100 डॉलर में केवल सब्जियों के बजाय दूध, ब्रेड, अंडे, अनाज, फल और दूसरी रोजमर्रा की जरूरतों को भी शामिल कर दिया जाए, तो यह रकम और तेजी से खत्म हो सकती है।
एक व्यक्ति के लिए सामान्य किराना खरीदारी में 100 डॉलर का बजट लगभग 5 से 7 दिनों तक चल सकता है। हालांकि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि सामान कहां से खरीदा जा रहा है, कौन-से ब्रांड लिए जा रहे हैं और व्यक्ति की खाने-पीने की आदतें कैसी हैं।
भारत और अमेरिका में एक ही रकम की अलग ताकत
यही अंतर मुद्रा की विनिमय दर और वास्तविक क्रय शक्ति के बीच फर्क को समझाता है। अगर कोई भारतीय 100 डॉलर को करीब 9,400 रुपये में बदलकर देखता है तो रकम बड़ी दिखाई देती है। लेकिन अमेरिका में उस रकम से उतनी ही मात्रा में सामान खरीद पाना संभव नहीं होता, जितना भारत में समान मूल्य की भारतीय मुद्रा से खरीदा जा सकता है।
यानी किसी देश की मुद्रा कितनी मजबूत है, इसका अंदाजा केवल डॉलर या रुपये के एक्सचेंज रेट से नहीं लगाया जा सकता। असल तस्वीर वहां की कीमतों, आय, किराए, ईंधन और रोजमर्रा की जीवन-यापन लागत से सामने आती है।
महंगाई बढ़ने पर और कमजोर होगी खरीद क्षमता
अमेरिका में ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल या डीजल तक सीमित नहीं रहता। सामान को खेतों और कारखानों से स्टोर तक पहुंचाने की लागत बढ़ती है तो उसका असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि किसी अमेरिकी उपभोक्ता के लिए 100 डॉलर की वास्तविक कीमत केवल बैंक खाते में दिखाई देने वाली रकम नहीं है। उससे कितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं, यही उसकी असली खरीद क्षमता तय करती है।
भारत में 100 डॉलर यानी करीब 9,400 रुपये सुनने में एक बड़ी रकम लग सकती है, लेकिन अमेरिका में महंगे जीवन-यापन के कारण इसकी वास्तविक खरीद क्षमता काफी अलग है। सब्जियों और फलों से लेकर दूध, अनाज और अन्य किराना सामान तक, 100 डॉलर का बजट कुछ ही दिनों की खरीदारी में खत्म हो सकता है। इसलिए अमेरिका की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि 1 डॉलर कितने रुपये का है। यह देखना भी जरूरी है कि उस 1 डॉलर से अमेरिका में वास्तव में कितनी चीजें खरीदी जा सकती हैं।