जिन्होंने दहेज नहीं, बेटी का सम्मान चुना
जिन्होंने दहेज नहीं, बेटी का सम्मान चुना
शिव शंकर कुशवाहा। ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर थी। सूर्य की प्रखर किरणों से धरती तप रही थी। खेतों की मेड़ों पर पसरी नीरवता और सूखी हवाओं के थपेड़े मानो प्रकृति की परीक्षा ले रहे थे। हर दृष्टि आकाश की ओर उठी हुई थी, जहाँ लोग वर्षा की पहली फुहार का स्वप्न संजोए बैठे थे। ऐसे ही समय में वर्षों बाद पुष्कर अपने गाँव लौटा था। उच्च शिक्षा के लिए विदेश गया यह युवक वहीं नौकरी करने लगा था, किंतु अपनी जन्मभूमि, गाँव और माता-पिता से उसका स्नेह कभी कम नहीं हुआ। माता-पिता की इच्छा पर उसने अपने ही गाँव की सुशिक्षित युवती कविता को जीवनसंगिनी बनाने का निर्णय लिया। वर्षों से बंद पड़े पुश्तैनी घर की साफ-सफाई, मरम्मत और रंग-रोगन का कार्य आरंभ हुआ। देखते ही देखते तीन महीने बीत गए और विवाह का शुभ मुहूर्त आ पहुँचा। उधर वधू पक्ष में भी खुशी का वातावरण था। श्रेयांश अपनी चार बहनों का इकलौता भाई था। सबसे छोटी बहन कविता उसके हृदय का सबसे अनमोल हिस्सा थी। वह चाहता था कि उसकी बहन का विवाह ऐसा हो, जिसे देखकर हर व्यक्ति प्रसन्न हो उठे। अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक व्यय करते हुए उसने विवाह की प्रत्येक व्यवस्था अत्यंत भव्य ढंग से की। मंडप की सजावट से लेकर अतिथियों के स्वागत तक हर छोटी-बड़ी बात पर उसकी दृष्टि थी।
बारात के आगमन का समय निकट आता गया और श्रेयांश की व्यस्तता बढ़ती गई। कभी वह रसोइयों को निर्देश देता, कभी सजावट करने वालों से व्यवस्था की बारीकियाँ समझाता और कभी घर आई महिलाओं के साथ आवश्यक कार्यों में जुट जाता। शाम ढलते ही दूर से बैंड की मधुर ध्वनि सुनाई दी। पूरा गाँव उल्लास से भर उठा। मंगलगीत गाती महिलाएं द्वार पर पहुँचीं और कुछ ही क्षणों में पालकी से दूल्हे पुष्कर का आगमन हुआ। पुष्कर के व्यक्तित्व में आकर्षण था, पर उससे कहीं अधिक उसकी विनम्रता लोगों का मन जीत रही थी। विदेश में वर्षों रहने के बाद भी उसकी आत्मा भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत थी। विवाह की प्रत्येक रस्म, लोकगीतों की प्रत्येक धुन और बड़ों के प्रत्येक आशीर्वाद को वह श्रद्धा से ग्रहण कर रहा था। परिछन की रस्म के बाद श्रेयांश स्वयं उसे कंधे पर बैठाकर मंडप तक ले गया। गाँव की महिलाएँ उस सुंदर जोड़ी को देखकर मन ही मन मंगलकामनाएँ करने लगीं।
इसी बीच दूल्हे के पिता कामेश्वर बाबू सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक होने के बावजूद उनमें तनिक भी अहंकार नहीं था। वे स्वयं प्रत्येक बाराती का हालचाल पूछते, बैठने की व्यवस्था देखते और सेवा-सत्कार में ऐसे लगे थे मानो कन्या पक्ष के मुखिया हों। उनके सहज व्यवहार ने हर व्यक्ति का मन मोह लिया। भोजन की व्यवस्था अत्यंत भव्य थी। सात प्रकार की मिठाइयाँ और अनेक व्यंजन परोसे गए थे। कुछ बाराती उत्साह में आवश्यकता से अधिक भोजन ले रहे थे और काफी अन्न व्यर्थ जा रहा था। यह दृश्य देखकर कामेश्वर बाबू शांत स्वर में प्रत्येक व्यक्ति से विनती करने लगे, ‘अन्न देवता का सम्मान कीजिए। जितना खा सकें, उतना ही लीजिए। एक दाना भी व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।’ उन्होंने परोसने वालों को भी निर्देश दिया कि जब तक पत्तल का भोजन समाप्त न हो, तब तक दोबारा भोजन न परोसा जाए। उनकी यह बात सुनकर सभी ने उनका सम्मान किया और भोजन की बरबादी रुक गई।
विवाह की सभी रस्में आनंदपूर्वक संपन्न हो रही थीं, किंतु कामेश्वर बाबू की अनुभवी दृष्टि बार-बार श्रेयांश और कविता के उदास चेहरों पर ठहर जाती। उत्सव के बीच भी दोनों के मन में कोई गहरी चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि इस मौन पीड़ा का कारण अवश्य जानेंगे। रात्रि में कोहबर की रस्म के पश्चात जब पुष्कर और कविता को एकांत मिला, तब पुष्कर ने स्नेहपूर्वक उसकी उदासी का कारण पूछा। पहले तो कविता ने बात टालने का प्रयास किया, किंतु पति के विश्वास और अपनत्व ने उसके मन का बाँध तोड़ दिया। आँसुओं के साथ उसने बताया कि विवाह के लिए दहेज की राशि जुटा पाना उसके भाई के लिए असंभव हो गया था। यही चिंता दोनों भाई-बहन को भीतर ही भीतर खाए जा रही थी।
प्रात: होते ही पुष्कर ने सारी बात अपने पिता को बता दी। सब सुनने के बाद कामेश्वर बाबू कुछ देर तक मौन बैठे रहे। फिर उन्होंने श्रेयांश को बैठक में बुलवाया। श्रेयांश आशंकित मन से पहुँचा। उसे लगा कि अब दहेज की चर्चा होगी और शायद कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो जाए। किंतु जो हुआ, उसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। कामेश्वर बाबू ने उसे अपने पास बैठाया, चाय पिलाई और विदा होते समय उसके हाथ में एक थैला रखते हुए कहा, ‘बेटा, तुम भी मेरे पुत्र समान हो। कविता अब मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है। विवाह आनंद का उत्सव होता है, किसी परिवार पर बोझ डालने का अवसर नहीं। निश्चिंत होकर बेटी की विदाई की तैयारी करो।’
श्रेयांश अवाक रह गया। उसके होंठ मौन थे, किंतु आँखें सब कुछ कह रही थीं। बाहर आकर जब उसने थैला खोला तो उसमें लगभग दस लाख रुपये रखे थे। कविता भी यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गई। दोनों भाई-बहन की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्हें समझ में आ गया कि कामेश्वर बाबू ने बिना किसी को अपमानित किए, बिना किसी प्रदर्शन के, उनके आत्मसम्मान की रक्षा कर ली थी।
उस दिन कामेश्वर बाबू केवल दूल्हे के पिता नहीं रहे। वे करुणा, संवेदनशीलता, उदारता और भारतीय संस्कारों की सजीव प्रतिमूर्ति बन गए। उन्होंने केवल एक बेटी की विदाई को सुखद नहीं बनाया, बल्कि दो परिवारों की गरिमा, सम्मान और आत्मविश्वास को भी सुरक्षित रखा। विदाई के समय वातावरण में आँसू भी थे और मुस्कान भी। पुष्कर को एक योग्य जीवनसंगिनी मिली, जबकि कविता को ससुर के रूप में ऐसा पिता मिला, जिसने उसे बहू नहीं, अपनी बेटी का स्थान दिया। समाज को ऐसे ही व्यक्तित्वों की आवश्यकता है, जो परंपराओं का सम्मान करते हुए कुरीतियों का साहसपूर्वक त्याग करें। धन से कहीं अधिक मूल्यवान मनुष्य का चरित्र और उसके संस्कार होते हैं। कामेश्वर बाबू की यह प्रेरक कथा हमें यही संदेश देती है कि जहाँ संवेदना जीवित रहती है, वहाँ रिश्ते केवल निभाए नहीं जाते, बल्कि जीवन भर सम्मान और प्रेम के साथ सँजोए जाते हैं।