हर नागरिक के सिर पर हो सुरक्षित छत, यही है सशक्त समाज की पहचान

हर नागरिक के सिर पर हो सुरक्षित छत, यही है सशक्त समाज की पहचान

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किसी भी देश के विकास का आकलन ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक सुविधाओं से नहीं किया जा सकता। विकास का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब प्रत्येक नागरिक के पास सुरक्षित और सम्मानजनक आवास हो। घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं है, यह व्यक्ति के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, आत्मसम्मान और बेहतर भविष्य की पहली शर्त है। दुर्भाग्य से आज विश्व के अनेक देशों की तरह भारत भी शहरी आवास संकट की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। बढ़ते शहरों, तेज जनसंख्या वृद्धि और महंगे होते मकानों ने लाखों परिवारों के लिए अपना घर खरीदना या बनाना कठिन बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र के आवास कार्यक्रम और विश्व शहरी मंच की विश्व शहर प्रतिवेदन-2026 के अनुसार विश्व की लगभग 40 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में आवास संबंधी कठिनाइयों से जूझ रही है। करोड़ों लोग ऐसे घरों में रह रहे हैं जहां स्वच्छ पेयजल, शौचालय, जल निकासी और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति बताती है कि शहरीकरण की गति तो तेज हुई है, लेकिन उसके अनुरूप बुनियादी सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया। बढ़ते शहरों ने रोजगार तो दिए हैं, पर सभी लोगों को सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक आवास उपलब्ध नहीं करा सके।

    इस समस्या का सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ती आवास लागत है। पिछले एक दशक में मकानों की कीमतें लोगों की आय की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा प्रभाव मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ा है। बड़ी संख्या में परिवार अपनी आय का महत्वपूर्ण हिस्सा किराये पर खर्च करने के लिए विवश हैं। ऐसे में शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य पर होने वाला खर्च प्रभावित होता है। जिन लोगों की आय सीमित है, वे अंतत: झुग्गियों, अस्थायी बस्तियों या भीड़भाड़ वाले छोटे कमरों में रहने को मजबूर हो जाते हैं। भारत में यह चुनौती और अधिक जटिल है। गांवों से रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग शहरों की ओर आते हैं, लेकिन शहरों में उनके लिए पर्याप्त और किफायती आवास उपलब्ध नहीं हो पाते। परिणामस्वरूप अनधिकृत बस्तियों का विस्तार होता है, जहां स्वच्छता, पेयजल, बिजली, जल निकासी और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव बना रहता है। ऐसी परिस्थितियां संक्रामक रोगों के प्रसार, प्रदूषण, असुरक्षा और सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती हैं। बेघर लोगों के लिए तो स्थिति और अधिक कठिन होती है, क्योंकि उन्हें खुले स्थानों, फुटपाथों या अस्थायी आश्रयों में जीवन बिताना पड़ता है।

    सरकार ने पिछले वर्षों में विभिन्न आवास योजनाओं के माध्यम से इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और निम्न आय वाले परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। इन योजनाओं से लाखों लोगों को लाभ भी मिला है, किंतु बढ़ती मांग की तुलना में उपलब्ध संसाधन अभी पर्याप्त नहीं हैं। भूमि की कमी, निर्माण लागत में वृद्धि, वित्तीय सीमाएं और अनेक प्रशासनिक बाधाएं इन योजनाओं की गति को प्रभावित करती हैं। इसलिए इस क्षेत्र में दीर्घकालिक और व्यापक नीति अपनाने की आवश्यकता है। आवास संकट का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। निजी क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों और सामाजिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में बड़े उद्योग स्थापित किए जाते हैं, वहां श्रमिकों और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए आवास निर्माण को भी विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इससे श्रमिकों का जीवन स्तर सुधरेगा और शहरों में अनियोजित बस्तियों के विस्तार पर भी रोक लगेगी। सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्गत इस दिशा में निवेश को प्रोत्साहन देना समय की मांग है।
    इसके साथ ही शहरी नियोजन को अधिक व्यावहारिक और दूरदर्शी बनाना होगा। नए नगरों और आवासीय क्षेत्रों के विकास में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए पर्याप्त भूमि आरक्षित की जानी चाहिए। सार्वजनिक परिवहन, विद्यालय, चिकित्सालय, पेयजल, स्वच्छता और हरित क्षेत्र जैसी सुविधाओं को आवास योजना का अभिन्न भाग बनाया जाए। यदि लोग अपने कार्यस्थल से बहुत दूर रहने के लिए विवश होंगे तो यातायात, प्रदूषण और जीवनयापन की लागत लगातार बढ़ती जाएगी। यह भी आवश्यक है कि बेघर लोगों की वास्तविक संख्या का नियमित और पारदर्शी आकलन किया जाए। अनेक लोग ऐसे हैं जो सरकारी अभिलेखों में बेघर नहीं माने जाते, जबकि उनका जीवन अत्यंत असुरक्षित और अस्थायी आवासों में गुजरता है। सही आंकड़ों के बिना प्रभावी नीति तैयार नहीं की जा सकती। इसी प्रकार किराये के किफायती आवासों को भी प्रोत्साहित करना होगा, ताकि शहरों में काम करने वाले श्रमिकों, विद्यार्थियों और निम्न आय वर्ग के लोगों को सम्मानजनक रहने का अवसर मिल सके।

    भारत आज तीव्र शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में आवास को किसी सामान्य निर्माण योजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह सामाजिक न्याय, आर्थिक प्रगति और मानवीय गरिमा से जुड़ा विषय है। जिस नागरिक के पास सुरक्षित घर नहीं है, उसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसर भी सीमित हो जाते हैं। यदि देश समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो प्रत्येक परिवार को सुरक्षित, स्वच्छ और किफायती आवास उपलब्ध कराना राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। जब शहरों की चमक के साथ वहां रहने वाले प्रत्येक नागरिक का जीवन भी सुरक्षित और सम्मानजनक होगा, तभी शहरी विकास वास्तव में सफल माना जाएगा।
    (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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