महंगाई व जीवनशैली

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भारत सहित विश्व के कई देश महंगाई से जूझ रहे हैं। महंगाई का एक सबसे बड़ा कारण रूस-यूक्रेन युद्ध है। डॉलर के मुकाबले रूपया कमजोर हुआ है, जिससे आयात महंगा हुआ है। रूपये की कीमत डॉलर के मुकाबले मात्र 78.20 रह गई है। हालांकि पिछले दिनों रूपये की कीमत में 12 पैसे सुधार भी हुआ है। कई देशों में हड़तालें चल रही हैं और वेतन बढ़ाने की मांग हो रही है। सरल शब्दों में कहें तो विदेशों से भारत आने वाली वस्तुएं खरीदने के लिए ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है व इन वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं।

देश में मुद्रास्फीति 7.8 प्रतिशत को तक पहुंच गई है, जो 2014 से सबसे ज्यादा है। खाद्य तेलों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। भले ही खाद्य तेलों व दालों में कुछ कमी आई है फिर भी मौजूदा कीमतों के बावजूद आम जनता के लिए यह मामूली सी राहत है। वनस्पति तेल की कीमत पिछले वर्ष से 26 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। भारतीय रिजर्व बैंक ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक ने रैपो रेट में बढ़ावा किया है। केंद्र सरकार व केंद्रीय बैंक अपने-अपने स्तर पर कई फैसले ले रहे हैं। अंतर्राष्टÑीय कारणों को दूर करना बेहद मुश्किल होता है। किसी देश के आंतरिक कारण निर्यात को कम-ज्यादा या रोककर महंगाई को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। फिर भी महंगाई की सबसे ज्यादा मार मध्यम वर्ग व गरीब वर्ग को पड़ रही है।

इसीलिए यह आवश्यक है कि यह वर्ग अपनी जीवनशैली को बदलें। विशेष तौर पर मध्यम वर्ग दिखावे की परंपरा का शिकार होने के कारण अपनी आय से ज्यादा खर्च न करें। कई लोग ऐसे होते हैं जो खाने-पीने की बजाए कपड़ों व अन्य सामान पर ज्यादा खर्च करते हैं जिस कारण उनकी जीवन जीने संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समस्याएं आती हैं। इन परिस्थितियों में विशेष तौर पर जब अंतर्राष्टÑीय परिस्थितियां भी अनुकूल न हों तो लोगों को दिखावे के चलन से बचना चाहिए।

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