हलका इंचार्ज से सोशल पर्यवेक्षक तक की जुगाड़बंदी

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राजनेताओं के पास नाम बदलने का ऐसा फार्मूला है कि रद्द की जा चुकी वस्तुओं/संस्थाओं/संकल्पों को नया नाम देकर फिर से लागू करने का जादू दिखा दिया जाता है। पंजाब में कांगे्रस सरकार भी अकाली दल जिन पर पैंतरों का विरोध करती थकती नहीं थी अब कांग्रेस भी उसी रास्ते को अपनाने लगी है लेकिन तरीका सिर्फ नाम बदलने का है। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने अकाली दल द्वारा हलका इंचार्ज नियुक्त करने को घटिया व राजनीति करार दिया था। अकाली दल अपने हारे हुए उम्मीदवार को खुश करने के लिए व पार्टी का प्रभाव बढ़ाने के लिए यह असंवैधानिक जुगाड़ बनाया है कि हारे हुए नेताओं को हलका इंचार्ज नियुक्त कर विकास कार्याें के लिए मिलने वाली ग्रांट की राशियों के चैक उनसे ही वितरित करवाए गए।

यह जुगाड़बंदी विरोधी पार्टी के विजेता रहे विधायक के साथ संविधान की नजर में एक धक्का था। अमरेन्द्र सिंह ने चुनावों से पहले बड़े जोर-शोर से ऐलान किया था कि कांग्रेस सरकार आने पर वह कोई हलका इंचार्ज नहीं लाएंगे बल्कि हर पार्टी के विधायक को सम्मान देंगे। बिना किसी संदेह इस किए गए ऐलान को अगर कांग्रेस सरकार में किसी ने लागू किया था तो वह थे कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू। सिद्धू ने विभिन्न शहरों को फायर बिग्रेड की गाड़ीयां देते समय उनकी झंडी संबंधित शहर के विधायक से दिलवाई, पार्टी चाहे उनकी कोई भी थी। अब मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह कह रहे हैं कि हमने हलका इंचार्ज नहीं लगाए ‘सोशल पर्यवेक्षक’ लाए हैं। नाम तो कोई भी रख लो। सोशल पर्यवेक्षक ने कार्य तो हलका इंचार्ज की तरह की करना है।

अब यह सोशल पर्यवेक्षक ही ग्रांट राशि वितरित कर विधायक को चिढ़ाएगा। क्या सोशल प्रयवैक्षक विधायक से अधिक अहम है? मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट कहा कि अकाली भाजपा सरकार ने कांग्रेसी विधायकों को ग्रांट राशि नहीं वितरित करने दी तो कांग्रेस सरकार यह अधिकार अकालियों को क्यों दे? बिना किसी संदेह यह फैसला राजनैतिक बदलेखोरी वाला ही है। सीधी सी बात यह है कि अब अकालियों को अनदेखा किया जा रहा है। ‘थप्पड़ मारना या थप्पड़ इनायत करना’ दोनों में कोई अंतर नहीं है, लगना तो थप्पड़ ही है। विधायक का सम्मान छीनकर सरकार ऊंची नहीं हो सकती।

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