Gen Z and the elderly: आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गए पुराने जमाने के पहरेदार! गूगल हावी हुआ

घर-मोहल्ले के बुजुर्गों के अनुभव से परहेज

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Old Generation vs. New Generation: मोहल्ले के नुक्कड़ पर बिछी वह लकड़ी की बेंच आज भी वहीं है, लेकिन उस पर बैठने वाले खादी के कुर्ते और सफेद धोती वाले वे बुजुर्ग अब कहीं दिखाई नहीं देते। वे बुजुर्ग, जिनकी आंखें पूरे मोहल्ले के लिए पहरेदार का काम करती थीं, आज आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गए हैं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में जब मां-बाप घर के भीतर सो रहे होते थे, तब यही बुजुर्ग गली के मोड़ पर बैठकर हर आते-जाते बच्चे पर अपनी पैनी नजर रखते थे। Gen Z and the elderly

किसी बच्चे का हाथ साइकिल के पैडल से फिसला नहीं कि उनकी तरफ से एक चीख गूंज उठती थी, संभलकर चल। स्कूल बंक करके कंचे खेलने वाले या किसी बाग से अमरूद चुराने वाले बच्चों के लिए वे साक्षात यमराज की तरह प्रकट हो जाते थे। गलती देखते ही वहीं डांट लगाना, कान उमठना और फिर शाम को सीधे उस बच्चे के घर पहुंचकर उसके मां-बाप को आगाह करना उनकी दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा था। वे इसे अपना अधिकार और सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी मानते थे।

सबसे खूबसूरत बात यह थी कि जब वे घर पर शिकायत लेकर पहुंचते थे, तो कोई मां-बाप उनसे लड़ता नहीं था। समाज में एक अटूट विश्वास था कि अगर मोहल्ले के किसी बुजुर्ग ने बच्चे को टोका है, तो वह बच्चे के भले के लिए ही होगा। मां-बाप उनकी बातों को पूरे सम्मान के साथ सुनते, उनका आभार जताते और फिर अपने बच्चे को समझाते-बुझाते थे। पूरा मोहल्ला एक संयुक्त परिवार की तरह सांस लेता था, जहां हर बच्चा पूरे मोहल्ले का बच्चा होता था। Gen Z and the elderly

लेकिन आज समय का पहिया ऐसा घूमा कि मोहल्ले तो दूर, खुद घर के भीतर भी बच्चों को कुछ समझाने या टोकने की हिमाकत कोई नहीं कर पाता। आधुनिकता के नाम पर हमने जिस नई दुनिया का निर्माण किया है, उसने हमारे रहने के ढंग के साथ-साथ हमारी सोच को भी पूरी तरह बदल दिया है। पुराने आत्मीय मोहल्लों का स्वरूप अब तेजी से सिकुड़ रहा है और उनकी जगह चमचमाती कंक्रीट की कॉलोनियों और गगनचुंबी अपार्टमेंट्स ने ले ली है। इन बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स के बंद फ्लैटों में लोग खुद को कैद कर चुके हैं। आज की स्थिति यह है कि एक ही मंजिल पर रहने वाला पड़ोसी सालों-साल दूसरे पड़ोसी का नाम तक नहीं जानता।

हर घर के दरवाजे पर एक अदृश्य बोर्ड टंगा है, जिस पर लिखा है कि कृपया हमारे निजी जीवन में दखल न दें। इस तथाकथित प्राइवेसी या निजता की संस्कृति ने समाज के उस ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है, जो कभी हमें एक सूत्र में बांधकर रखता था। जब पड़ोसी ही पड़ोसी से बेगाना हो गया, तो भला कोई किसी के बच्चे की गलती पर जुबान खोलने का जोखिम क्यों उठाएगा। आज अगर कोई बुजुर्ग किसी बच्चे को उसकी भलाई के लिए भी टोक दे, तो बच्चे के माता-पिता ही लाठी-डंडा लेकर या पुलिस की धमकी देते हुए बुजुर्ग के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं कि आपने हमारे बच्चे को बोलने की हिम्मत कैसे की। Gen Z and the elderly

इस सांस्कृतिक और नैतिक पतन के पीछे पाश्चात्य सभ्यता की वह अंधी नकल है, जिसने हमारे युवाओं को पूरी तरह से 'जेन जी' यानी एक ऐसी नई पीढ़ी में बदल दिया है, जो जड़ों से कटी हुई है। पश्चिमी देशों की व्यक्तिवादी सोच को अपनाकर यह पीढ़ी मानती है कि वे पूरी दुनिया में सबसे अलग और सबसे होशियार हैं। इस पीढ़ी के व्यवहार में एक अजीब-सा उथलापन, अधीरता और अहंकार साफ देखा जा सकता है। खुद को अपने माता-पिता और दादा-दादी से ज्यादा बुद्धिमान समझना इन युवाओं की फितरत बन चुकी है।

इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में गूगल को अपना सब कुछ मानने वाले इन युवाओं को लगता है कि जीवन का हर ज्ञान स्क्रीन स्क्रॉल करने से मिल सकता है। वे यह भूल जाते हैं कि ज्ञान और अनुभव में बहुत बड़ा फर्क होता है। जो अनुभव बुजुर्गों के माथे की झुर्रियों और सफेद बालों में छुपा होता है, उसे किसी सर्च इंजन से डाउनलोड नहीं किया जा सकता। बड़ों की सीख को 'ओल्ड स्कूल' या दकियानूसी कहकर खारिज कर देना इस पीढ़ी का फैशन बन गया है, जिसके कारण वे एक वैचारिक और नैतिक शून्य में जी रहे हैं।

कुल मिलाकर, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सिर्फ ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़ी कंपनियां बनाने से पूरी नहीं होती, बल्कि इसके लिए नागरिकों के भीतर नैतिक मूल्यों और चरित्र का होना अनिवार्य है। यदि देश की युवा शक्ति संस्कारविहीन, उच्छृंखल और अमर्यादित हो जाएगी, तो आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बाद भी हम एक खोखले राष्ट्र के रूप में खड़े होंगे। बुजुर्ग समाज की वह नींव होते हैं, जो अदृश्य रहकर भी पूरे मकान का बोझ संभाले रखते हैं। Gen Z and the elderly

उनकी डांट में कोई दुश्मनी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को तराशने की ममता छुपी होती थी। अगर हमें अपनी संस्कृति, अपने देश और अपने समाज को इस गर्त में गिरने से बचाना है, तो हमें कॉलोनियों और अपार्टमेंट्स की बंद दीवारों को तोड़कर फिर से उस मोहल्ला संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि बड़ों का टोकना उनकी आजादी पर हमला नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा का कवच है। जब तक समाज में बुजुर्गों को उनका वह पुराना पहरेदार वाला हक वापस नहीं मिलेगा, तब तक जंतर-मंतर से लेकर देश के कोने-कोने तक मर्यादाएं ऐसे ही तार-तार होती रहेंगी और हम असहाय होकर अपने ही भविष्य को बिखरते देखते रहेंगे।

संजय सक्सेना, लखनऊ (यह लेखक के अपने विचार हैं )।

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