‘हिरोशिमा त्रासदी’ की विभीषिका का दर्द?

‘हिरोशिमा त्रासदी’ की विभीषिका का दर्द?

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डॉ.रमेश ठाकुर। नव इतिहास में ‘6 अगस्त 1945’ की तारीख को शायद ही कोई भूल पाए। 'हिरोशिमा दिवस' के रूप में मनाई जाती है, ये तारीख। तारीख में ऐसा मुकर्रर वक्त था, जिसने मात्र 16 मिनट के भीतर 1,30,000 लोगों की सांसें एक साथ रोकी थी। हताहतों का आकंड़ा फिलहाल सरकारी है, पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। हिरोशिमा पर किए परमाणु हमले में मरने वालों में बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें भी थीें। सुबह करीब 8:15 बजे अमेरिका ने हिरोशिमा पर अपने ‘बी-29 -एनाला गे’ विमान द्वारा आसमान से परमाणु बमों की बारिश करके पूरा शहर जिंदा जला दिया था। घटना के वक्त ज्यादातर लोग सोए हुए थे, परमाणु बम ने उन्हें सोता ही मार दिया। हिरोशिमा में जब परमाणु बम फोड़ा गया, तो जापानियों को लगा कि सूरज फटा है। जबकि, वह सूरज नहीं, बल्कि तथाकथित विकसित, सभ्य और मुट्ठी भर लोगों का निर्णय तथा एक महाशक्ति द्वारा निर्मित कृत्रिम सूरज था, जिसकी आग में लाखों निर्दोष लोग भाप बनकर चंद मिनटों में उड़ गए। घटना का सामूहिक हत्यारा अमेरिका था।

    अगस्त माह की जब 6 तारीख आती है या फिर परमाणु हथियारों की बढ़ती तादात पर वैश्विक मंचों पर विमर्श होता है, तो जापान की दिल दहला देने वाली यह घटना आंखों के सामने अनायास उमड़ पड़ती हैं। घटना को श्रद्धांजलि के तौर पर ही सालाना 6 अगस्त को ‘हिरोशिमा दिवस’ के रूप में विश्व मनाता है। यह दिन उन मुल्कों को संकल्पित होने को आहवान भी करवाता है, जो परमाणु बम फोड़ने की अनावश्यक धमकी दिया करते हैं। साथ ही अहिंसा, त्रासदी, को छोड़कर भाईचारा अपनाने और शांति के पथ पर चलने को जागरूक भी करता है। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर गिराए गए अलग-अलग तारीखों पर परमाणु बम की यह कहानी काले अध्याय के रूप में तबतक दर्ज रहेगी, जबतक दुनिया इस धरती पर वास करेगी। 6 अगस्त को गिराए पहले बम का नाम ‘एनाला गे’ था। वहीं, 9 अगस्त वाले बम का नाम ‘लिटिल बॉय’ यानी यूरेनियम-आधारित परमाणु बम था।

    भारत सदैव इस बात का पक्षधर रहा है कि परमाणु हथियारों का बेजा इस्तेमाल कभी ना किया जाए। हालांकि, वैश्विक लेबर पर परमाणु हथियारों के प्रतिबंध पर प्रयास बहुतेरे होते रहे। इस मसले पर 26 जनवरी 1946 को संयुक्त राष्ट्र ने अणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की। उसके एक साल बाद फरवरी 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद द्वारा परंपरागत हथियार आयोग की स्थापना भी की गई। सन 1952 में महासभा ने उपर्युक्त दोनों आयोगों को संयुक्त करके निरस्त्रीकरण आयोग के नाम से एक नया आयोग भी बनाया। आयोग को परंपरागत और परमाणु दोनों प्रकार के हथियारों के नियमन के संदर्भ में संधि के प्रारूप तैयार करने का दायित्व सौंपा गया। इतना सब कुछ होने के बाद भी मकसद सफल नहीं हुआ।        -यह लेखक के अपने विचार हैं
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