‘गुरू’ मीठा, प्यारा, सुखदायक और दिल में ठंडक बरसाने वाला, परम पूजनीय शब्द है

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सतगुरू के प्यारे-प्रेमियों के लिए ‘गुरू’ शब्द ही अति प्यारा और मन को भाता है। अपने गुरू के प्यार में रंगे हुए किसी गुरू-भक्त का बयान है- ‘‘ऐ मेरे दिल! मैं ऐसी किस आवाज (शब्द) को सुन रहा हूं, जिस कारण मेरा दिल दरिया में प्रेम की तरंगे हिलोरें ले रही हैं और मेरी आत्मा किसी अजीब नशे की खुमारी में मस्त हो गई है।’’ ‘गुरू’ कितना मीठा, कितना प्यारा, कितना सुखदायक और दिल में ठंडक बरसाने वाला, परम पूजनीय शब्द है। आत्म-सुख, शांति और आनंद रस का स्त्रोत यह महान अक्षर ‘गुुरू’ तमाम अक्षरों का सुल्तान बादशाह और सारे संसार की जान है। हम इस ‘गुरू’ अक्षर पर कुर्बान जाते हैं। गुुरू के मिलने पर जीव यह अनुभव करने लग जाता है कि मेरे दिल से तमाम फिक्रों और गमों के बोझ उतर गए हैं। क्या मैंने इस दुनिया से उड़कर किसी बैकुंठ या अमर देश में जा प्रवेश किया है। ‘गुरू’ शब्द जुबान पर आते ही जीभ पवित्र हो जाती है। ‘गुरू’ के महान अक्षर से अमृत के झरने झरते हैं, जिसे पीकर जीव के जन्मों-जन्मों के पाप कट जाते हैं। मन निर्मल, शरीर पाक तथा वाणी पवित्र हो जाती है और अंतर आत्मा बेअंत सुख व आनंद के रस का पान करती है। गुुरू का आशिक (प्रेमी) कहता है कि मेरे प्रियतम ‘गुरू’ का नाम सब नामों (अक्षरों) का सिरताज है जो परम पवित्र और पूजनीय है।

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जब हमारे कानों में प्यार भरे इस मीठे शब्द की धुनि सुनाई देती है, तो हमारी आत्मा अजीब नशे में दीवानी होकर खुशी में नाच उठती है, आंखों से प्रेम के समुद्र छलकने लगते हैं और हमें तन-बदन की होश भी नहीं रहती। हम जान कुर्बान करते हैं उनके कदमों पर ‘जिन्होंने सारे आलम (दुनिया) की’ रूहें-रवां (जी-जान) और सब ज्ञानों के सार इस ‘गुरू’ शब्द को बनाया है।

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