Cotton Cultivation: हल्की बारिश से खेतों में खिली कपास, कृषि विशेषज्ञों ने जारी की किसानों को अहम सलाह

जानें, बारिश के बाद किसानों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

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भिवानी (इन्द्रवेश)। खरीफ मौसम में समय पर मिलने वाली हल्की वर्षा को कृषि विशेषज्ञ फसलों के लिए सबसे उपयोगी प्राकृतिक संसाधनों में मानते हैं। भिवानी क्षेत्र में हाल में हुई वर्षा ने विशेष रूप से कपास की फसल को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस समय अधिकांश खेतों में कपास पौधों की बढ़वार के चरण में है। ऐसे में मिट्टी में बढ़ी नमी, पोषक तत्वों की उपलब्धता और तापमान में आई संतुलित कमी पौधों के स्वस्थ विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रही है। इससे आने वाले समय में बेहतर शाखा विकास, फूल बनने की प्रक्रिया और उत्पादन क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। Cotton Cultivation

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में कपास की अधिकांश बुवाई मई के मध्य तक पूरी हो चुकी थी। वर्तमान में पौधे सक्रिय वृद्धि की अवस्था में हैं। हल्की बारिश के कारण पहले से डाली गई उर्वरक सामग्री मिट्टी में अच्छी तरह घुलकर जड़ों तक पहुंच सकेगी। इससे पौधों की पोषण क्षमता बढ़ेगी और उनकी बढ़वार अधिक संतुलित होगी। धान और विभिन्न सब्जी फसलों को भी इस प्राकृतिक नमी का लाभ मिलने की उम्मीद है।

हालांकि सभी फसलों पर वर्षा का प्रभाव समान नहीं है। कुछ किसानों का कहना है कि ग्वार और बाजरे वाले खेतों में हल्की वर्षा के बाद मिट्टी की ऊपरी सतह पर पपड़ी बनने की समस्या दिखाई दी है। ऐसी स्थिति में समय पर हल्की गुड़ाई या निराई करने से मिट्टी भुरभुरी बनी रहती है और जड़ों तक हवा तथा नमी का बेहतर संचार होता है। यदि कहीं पानी रुकता है तो उसे शीघ्र निकालना भी आवश्यक है, क्योंकि जलभराव से पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

कृषि विज्ञान केंद्र की विशेषज्ञों ने किसानों को अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचने की सलाह दी है। उनका कहना है कि बिना आवश्यकता बार-बार स्प्रे करने से केवल हानिकारक कीट ही नहीं, बल्कि फसलों की रक्षा करने वाले मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं। इससे भविष्य में कीट प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है तथा उत्पादन लागत भी अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है। इसलिए खेतों में पहले पैरामोन ट्रैप लगाकर कीटों की वास्तविक संख्या का आकलन करना चाहिए। आर्थिक क्षति स्तर से अधिक प्रकोप मिलने पर ही वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उचित कीटनाशक का प्रयोग करना बेहतर रहता है।

सब्जी उत्पादक किसानों को भी इस वर्षा से राहत मिली है। बैंगन, घीया और तोरी जैसी फसलों में नमी बढ़ने से पौधों की वृद्धि बेहतर रहने की संभावना है। यदि आगे भी नियमित वर्षा होती रही तो कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए खारे पानी पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे फसलों की गुणवत्ता, उत्पादन तथा मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मानसून सामान्य बना रहता है और किसान वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फसल प्रबंधन अपनाते हैं, तो खरीफ मौसम की प्रमुख फसलों से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। Cotton Cultivation

विशेषज्ञ की सलाह

वैज्ञानिक तरीके से करें फसल प्रबंधन: कपास सहित सभी खरीफ फसलों में नियमित खेत निरीक्षण करें। जलभराव बिल्कुल न होने दें और मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई का निर्णय लें। कीट नियंत्रण के लिए पहले पैरामोन ट्रैप या अन्य निगरानी साधनों का उपयोग करें। केवल आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें ताकि मित्र कीट सुरक्षित रहें और उत्पादन लागत भी नियंत्रित रहे।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • हल्की वर्षा से मिट्टी में नमी बढ़ने पर उर्वरकों का अवशोषण बेहतर होता है।
  • कपास की बढ़वार के समय पर्याप्त नमी पौधों के विकास के लिए लाभकारी मानी जाती है।
  • खेतों में लंबे समय तक पानी रुकने से जड़ संबंधी रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
  • वर्षा के बाद खरपतवार तेजी से उगते हैं, इसलिए समय पर निराई-गुड़ाई आवश्यक है।
  • एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने से उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है।

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