ईवीएम में जनादेश बंद, सियासत में शुरू हुआ 'बाड़ेबंदी' का खेल; संभावित त्रिशंकु बोर्ड ने बढ़ाई बेचैनी

हनुमानगढ़ में मतदान खत्म होते ही तेज हुई सियासी हलचल, कांग्रेस, भाजपा और विधायक गणेश राज बंसल खेमे की धड़कनें बढ़ीं

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हनुमानगढ़ (सच कहूँ न्यूज़)। चुनावी शोर थम गया है। झंडे-बैनर सिमट गए हैं। गलियों और चौक-चौराहों पर प्रचार की गहमागहमी की जगह अब सियासी खामोशी पसरी है। लेकिन यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि 14 सितंबर को खुलने वाली ईवीएम से पहले की बेचैनी भरी शांति है। जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है और अब कांग्रेस, भाजपा तथा निर्दलीय विधायक गणेश राज बंसल खेमे में नतीजों को लेकर जोड़-घटाव और रणनीति का दौर शुरू हो गया है।

नगर परिषद के 60 वार्डों में इस बार मुकाबला बेहद पेचीदा माना जा रहा है। मतदाताओं के रुख को लेकर आखिरी समय तक कोई भी खेमा स्पष्ट दावा करने की स्थिति में नहीं दिखा। यही वजह है कि मतदान खत्म होते ही संभावित 'बाड़ेबंदी' की चर्चाओं ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है। हालांकि प्रत्याशियों को बाहर ले जाने और उनके ठिकानों को लेकर सामने आ रही सूचनाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

मतदाता ने साधी खामोशी, सियासी पंडित भी हुए परेशान

इस चुनाव की सबसे खास बात मतदाताओं की चुप्पी रही। उम्मीदवार घर-घर पहुंचे, हाथ जोड़कर वोट मांगा, लेकिन मतदाता ने किसी को निराश नहीं किया। हर प्रत्याशी को मुस्कुराकर आश्वासन मिला, मगर किसे वोट दिया, इसका राज वोटर ने अपने तक ही रखा। सर्वे करने वालों के सामने भी मतदाता का रुख काफी हद तक तटस्थ नजर आया। यही खामोशी अब राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी पहेली बनी हुई है। लंबे समय से चुनावी राजनीति को करीब से देखने वालों का कहना है कि मतदाता जब अपना पत्ता आखिरी क्षण तक नहीं खोलता, तो नतीजों का अनुमान लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

मतदान खत्म होते ही शुरू हुआ 'ऑपरेशन बाड़ेबंदी'!

मतदान समाप्त होते ही राजनीतिक खेमों में अपने संभावित विजेता पार्षदों को सुरक्षित रखने की कवायद की चर्चाएं तेज हो गईं। कांग्रेस के बारे में सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि उसके अधिकृत और संभावित विजेता प्रत्याशियों को विशेष बसों के जरिए जिले से बाहर ले जाया गया है। चर्चा है कि इन्हें हिमाचल प्रदेश के सुरक्षित ठिकानों पर रखा गया है। पार्टी नेतृत्व लगातार प्रत्याशियों के संपर्क में बताया जा रहा है। इसी बीच कांग्रेस के दो प्रत्याशियों से मतदान के बाद संपर्क नहीं होने की भी चर्चा सामने आई। राजनीतिक गलियारों में उनके विधायक गणेश राज बंसल खेमे के संपर्क में जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन चर्चाओं की भी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बंसल खेमे की दो माह पहले से तैयारी की चर्चा

निर्दलीय विधायक गणेश राज बंसल खेमे की रणनीति को लेकर भी सियासी हलचल तेज है। चर्चाओं के अनुसार संभावित नतीजों को देखते हुए खेमे ने करीब दो माह पहले ही मंडावा में एक रिसॉर्ट की अग्रिम बुकिंग करवा ली थी। मतदान के बाद समर्थक प्रत्याशियों को एक तय स्थान पर एकत्र कर वहां से सुरक्षित वाहनों के जरिए मंडावा ले जाने की चर्चा है। हालांकि ऐन वक्त पर ठिकाना बदले जाने की बात भी राजनीतिक गलियारों में चल रही है। बंसल खेमा अपने समर्थक प्रत्याशियों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। फिलहाल इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

भाजपा भी सतर्क, 'प्रशिक्षण शिविर' के बहाने एकजुटता की कवायद

भाजपा भी संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। पार्टी प्रत्याशियों को 'प्रशिक्षण शिविर' के नाम पर एकत्र करने की चर्चा है। इसके बाद उन्हें योजनाबद्ध तरीके से सुरक्षित ठिकानों पर रखने की कवायद की बात सामने आ रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संभावित विजेता पार्षदों को एकजुट रखने की होगी। सत्ता पक्ष होने के कारण पार्टी किसी भी स्थिति में अपने पार्षदों के दूसरे खेमे में जाने का जोखिम नहीं लेना चाहेगी।

कांग्रेस पिछड़ी तो भी बन सकती है किंगमेकर

स्थानीय राजनीतिक आकलनों के अनुसार नगर परिषद में इस बार किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना कमजोर दिखाई दे रही है। जमीनी सर्वे के अनुमान में कांग्रेस को करीब 8 से 12 सीटों तक सीमित रहने का आकलन किया गया है। यदि यह अनुमान नतीजों में बदलता है तो पिछले चुनाव में 35 सीटें जीतकर बोर्ड बनाने वाली कांग्रेस को बड़ा झटका माना जाएगा। दूसरी ओर भाजपा के खाते में करीब 22 से 25 सीटें आने का अनुमान लगाया जा रहा है। पार्टी पिछले चुनाव की 18 सीटों की तुलना में बढ़त बनाती दिख रही है, लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 31 सीटों का आंकड़ा फिर भी दूर रहेगा। सबसे दिलचस्प तस्वीर विधायक गणेश राज बंसल के निर्दलीय खेमे की बताई जा रही है। जमीनी आकलन में इस खेमे को 23 से 26 सीटों के बीच मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि यह गणित सही साबित हुआ तो नगर परिषद में सत्ता की चाबी किसी एक पार्टी के पास नहीं, बल्कि जोड़-तोड़ के समीकरणों के बीच घूमती नजर आ सकती है।

एक-एक पार्षद बनेगा 'किंगमेकर'

अगर चुनाव परिणाम इन अनुमानों के आसपास रहे तो बोर्ड गठन की राह आसान नहीं होगी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के 8-10 पार्षद भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भाजपा और बंसल खेमे के बीच मुकाबला बहुमत से दूर रहा तो छोटे समूह के पार्षदों की पूछ अचानक बढ़ सकती है। यही वह स्थिति है, जिसने मतदान खत्म होते ही राजनीतिक खेमों की चिंता बढ़ा दी है। हर खेमा अपने संभावित विजेताओं को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश में जुटा है। चर्चाएं यहां तक हैं कि 14 सितंबर को मतगणना के बाद जीतने वाले पार्षद भी सीधे आजाद नहीं होंगे, बल्कि सभापति चुनाव तक उन्हें फिर से एकजुट रखने की कवायद शुरू हो सकती है।

14 सितंबर को खुलेगा ईवीएम का पिटारा, तभी सामने आएगी असली तस्वीर

फिलहाल सभी दावे, आकलन और राजनीतिक गणित ईवीएम में बंद हैं। 14 सितंबर को मतगणना के दौरान जब ईवीएम खुलेंगी, तभी पता चलेगा कि मतदाता ने किसे अपना आशीर्वाद दिया और किसे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। एक तरफ कांग्रेस अपने पुराने जनाधार को बचाने की लड़ाई में है, दूसरी तरफ भाजपा बढ़त को बोर्ड में बदलने की कोशिश में है, जबकि विधायक गणेश राज बंसल का निर्दलीय खेमा दोनों प्रमुख दलों के बीच अपना मजबूत विकल्प पेश कर रहा है। मतदान खत्म हो चुका है, लेकिन असली सियासी खेल अब शुरू हुआ है। ईवीएम बताएगी जनता ने किसे चुना और उसके बाद शुरू होगा बोर्ड बनाने के लिए बहुमत जुटाने का खेल। 14 सितंबर के बाद हनुमानगढ़ की सियासत में कौन सिकंदर बनता है और कौन किंगमेकर-इसका फैसला अब जनादेश करेगा।

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