Ramlila: कैराना का ‘काल’ बना सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल
रामलीला शुभारंभ के अगले दिन रविवार को कैराना में निकाला गया काल का जुलूस
कैराना (सच कहूँ न्यूज़)। Kairana News: हाथ में लकड़ी की तलवार, शरीर पर काला रंग और पीछे दौड़ती हजारों लोगों की भीड़। कैराना की गलियों में जब ‘काल’ निकलता है तो पूरा नगर एक अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का साक्षी बनता है। नगर में श्री रामलीला महोत्सव के शुरू होने के साथ ही निकलने वाला काल का जुलूस केवल आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे की भी अनूठी मिसाल पेश करता है।
काल के नगर में निकलते ही बच्चे, युवा और बुजुर्ग उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। काले रंग में रंगा व्यक्ति हाथ में लकड़ी की तलवार लेकर लोगों के पीछे दौड़ता है और तलवार से प्रतीकात्मक प्रहार करता है। स्थानीय मान्यता है कि काल के हाथों मार खाना शुभ होता है। यही कारण है कि लोग उससे बचने के साथ-साथ उसके पास पहुंचकर इस परंपरा का हिस्सा बनने के लिए भी उत्साहित रहते हैं। कपड़ों पर काला रंग लगने के बावजूद श्रद्धालु इसे प्रसाद स्वरूप मानते हैं और काल को दक्षिणा भी भेंट करते हैं।
मुस्लिम समाज भी निभाता है अहम भागीदारी
इस परंपरा की सबसे विशेष बात कैराना का सांप्रदायिक सौहार्द है। मुस्लिम बहुल आबादी वाले नगर में रामलीला आयोजन से लेकर काल जुलूस तक मुस्लिम समाज के लोग भी बढ़-चढ़कर सहयोग करते हैं। जुलूस की व्यवस्थाओं, संचालन और अन्य तैयारियों में दोनों समुदायों की सहभागिता कैराना की गंगा-जमुनी तहजीब को जीवंत करती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से यह परंपरा आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ चली आ रही है। रामलीला के दौरान धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता की जो तस्वीर दिखाई देती है, वह कैराना की अलग पहचान बन चुकी है।
रावण से जुड़ी है ‘काल’ की मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, रामायण काल में रावण ने अपनी शक्ति के अहंकार में काल को बंदी बना लिया था। माना जाता है कि भगवान श्रीराम द्वारा लंका पर चढ़ाई और रावण के विनाश के बाद काल को मुक्त कराया गया। इसी मान्यता से जोड़कर रामलीला के शुभारंभ से पहले काल का जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है।
करीब 93 वर्षों से कैराना में रामलीला की परंपरा को सहेजा जा रहा है। बदलते समय के बावजूद काल जुलूस का स्वरूप और उसके प्रति लोगों का उत्साह आज भी कायम है। कैराना का काल जुलूस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश भी देता है। भगवान श्रीराम की भक्ति और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का यह संगम लोगों को यह संदेश देता है कि पर्व और परंपराएं समाज को जोड़ने तथा आपसी प्रेम को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं।
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