विद्यार्थियों के लिए सरल बने उच्च शिक्षा का ढांचा

विद्यार्थियों के लिए सरल बने उच्च शिक्षा का ढांचा

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धुर्जती मुखर्जी। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को अधिक विकल्प देना, उनकी रुचि के अनुरूप अध्ययन का अवसर उपलब्ध कराना और शिक्षा को व्यापक बनाना है। यह सोच स्वागत योग्य है, लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। हरियाणा के सरकारी महाविद्यालयों में विषय चयन को लेकर सामने आ रही समस्याएं बताती हैं कि व्यवहारिक स्तर पर अभी अनेक कमियां मौजूद हैं। इसका सबसे अधिक असर उन विद्यार्थियों पर पड़ रहा है जो उच्च शिक्षा की शुरूआत बड़े सपनों के साथ करते हैं। कला संकाय के अनेक विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों का कहना है कि विषयों के चयन की प्रक्रिया इतनी जटिल हो गई है कि उन्हें समझना कठिन हो रहा है। प्रमुख विषय, सहायक विषय, वैकल्पिक विषय और कौशल आधारित विषय जैसी व्यवस्थाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी न मिलने से विद्यार्थी असमंजस में निर्णय ले रहे हैं। बाद में उन्हें महसूस होता है कि चुने गए विषय उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि, रुचि या भविष्य की योजना के अनुरूप नहीं हैं। ऐसी स्थिति विद्यार्थी के आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है।

    यह भी विचारणीय है कि किसी विद्यार्थी की बारहवीं तक की तैयारी यदि इतिहास, राजनीति विज्ञान, भाषा, समाजशास्त्र या अन्य कला विषयों में रही हो तो उससे अचानक विज्ञान विषयों में समान दक्षता की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता। विज्ञान विषयों में प्रयोगात्मक समझ, गणनात्मक क्षमता और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। पर्याप्त आधार के बिना ऐसे विषयों का अध्ययन विद्यार्थियों के लिए कठिनाई बढ़ा सकता है। शिक्षा का उद्देश्य चुनौती देना अवश्य है, पर ऐसी चुनौती उचित नहीं कही जा सकती जो विद्यार्थी की मूल तैयारी से पूरी तरह अलग हो। नई शिक्षा नीति बहुविषयक अध्ययन की बात करती है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि विद्यार्थियों की रुचि और शैक्षणिक पृष्ठभूमि की उपेक्षा कर दी जाए। विविध विषयों का परिचय लाभदायक हो सकता है, किंतु विषयों का चयन विद्यार्थी की क्षमता, उपलब्ध संसाधनों और महाविद्यालय की व्यवस्था को ध्यान में रखकर होना चाहिए। लचीलापन तभी सार्थक बनता है जब विद्यार्थी को वास्तविक विकल्प प्राप्त हों और वह पूरी जानकारी के साथ निर्णय ले सके।

    ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों से आने वाले विद्यार्थियों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है जो परिवार में पहली बार महाविद्यालय तक पहुंचते हैं। उन्हें घर से शैक्षणिक मार्गदर्शन कम मिल पाता है। यदि प्रवेश के समय महाविद्यालय भी स्पष्ट परामर्श उपलब्ध नहीं कराता, तो विषय चयन में गलती की संभावना बढ़ जाती है। बाद में यही निर्णय परीक्षा परिणाम, आत्मविश्वास और रोजगार की संभावनाओं पर प्रभाव डाल सकता है।

    इस समस्या का समाधान कठिन नहीं है। प्रत्येक महाविद्यालय में प्रभावी छात्र परामर्श व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। प्रवेश से पहले विद्यार्थियों को सभी विषयों, उनकी उपयोगिता, अध्ययन पद्धति और आगे मिलने वाले अवसरों की स्पष्ट जानकारी दी जाए। महाविद्यालयों में उपलब्ध विषयों और संसाधनों की सूची पहले से सार्वजनिक हो, ताकि विद्यार्थी सोच-समझकर निर्णय ले सकें। जहां आवश्यक प्रयोगशालाएं या शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, वहां ऐसे विषयों को औपचारिक रूप से जोड़ने के बजाय व्यवहारिक व्यवस्था विकसित करना अधिक उचित होगा। उच्च शिक्षा विभाग को समय-समय पर विद्यार्थियों, शिक्षकों और महाविद्यालय प्रमुखों से संवाद भी करना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में सुधार संवाद, पारदर्शिता और विश्वास के आधार पर ही संभव है। यदि विद्यार्थी यह नहीं समझ पा रहा कि उसे कौन-सा विषय क्यों पढ़ना है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है। ऐसी स्थिति में समीक्षा कर आवश्यक सुधार करना प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है।

  हरियाणा में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है और बड़ी संख्या में युवा महाविद्यालयों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे समय में विषय चयन की प्रक्रिया जितनी सरल, स्पष्ट और विद्यार्थी केंद्रित होगी, उतना ही शिक्षा का उद्देश्य सफल होगा। नीति का मूल्य उसके दस्तावेज में नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के अनुभव में दिखाई देता है। यदि हर विद्यार्थी अपनी रुचि, योग्यता और भविष्य की योजना के अनुरूप विषय चुन सके, तभी शिक्षा वास्तव में सशक्त और उपयोगी बन पाएगी।
    यह लेखक के अपने विचार हैं

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