Earth News: धरती के 12 KM अंदर क्या मिला? वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी खोज

धरती के भीतर 12 किलोमीटर तक गहरा गड्ढा खोदने की ऐतिहासिक कोशिश

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अनु सैनी। Earth News: "अगर आज आपसे पूछा जाए कि इंसान ने धरती के अंदर सबसे गहरा गड्ढा कितनी गहराई तक खोदा है, तो शायद आपका जवाब कुछ सौ मीटर या एक-दो किलोमीटर होगा। लेकिन सच इससे कहीं ज्यादा है। इंसान ने धरती की सतह को चीरते हुए 12 किलोमीटर से भी अधिक गहराई तक पहुंचने में सफलता हासिल की थी। यह सिर्फ एक गड्ढा नहीं था, बल्कि विज्ञान के इतिहास का ऐसा प्रयोग था, जिसने हमारी पृथ्वी को समझने का नजरिया बदल दिया।"

सन् 1970 की बात है। पूरी दुनिया दो महाशक्तियों के बीच चल रहे शीत युद्ध यानी कोल्ड वॉर की गवाह बन रही थी। एक तरफ था अमेरिका और दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों देशों के बीच हथियारों की होड़ थी, अंतरिक्ष में पहले पहुंचने की होड़ थी और विज्ञान के हर क्षेत्र में एक-दूसरे से आगे निकलने की जंग चल रही थी।
1957 में सोवियत संघ ने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक अंतरिक्ष में भेजकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसके बाद 1961 में यूरी गागरिन अंतरिक्ष में जाने वाले पहले इंसान बने। अमेरिका भी पीछे नहीं रहना चाहता था और उसने अपोलो मिशन के जरिए चंद्रमा तक पहुंचने की तैयारी शुरू कर दी थी।

लेकिन अंतरिक्ष की इस दौड़ के समानांतर एक और ऐसी वैज्ञानिक प्रतियोगिता चल रही थी, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यह प्रतियोगिता थी धरती के भीतर झांकने की। वैज्ञानिकों के मन में वर्षों से एक सवाल था—जिस ग्रह पर हम रहते हैं, उसके नीचे आखिर क्या छिपा है? क्या किताबों में पढ़ाए जाने वाले पृथ्वी के मॉडल वास्तव में सही हैं, या वास्तविकता कुछ और है?

उस समय वैज्ञानिक केवल भूकंप से निकलने वाली तरंगों के आधार पर अनुमान लगाते थे कि धरती के भीतर अलग-अलग परतें मौजूद हैं। लेकिन किसी ने भी उन परतों को अपनी आंखों से नहीं देखा था। इसलिए अमेरिका ने 1960 के दशक की शुरुआत में एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, जिसका नाम था प्रोजेक्ट मोहोल (Project Mohole)। इस परियोजना का उद्देश्य था समुद्र के नीचे ड्रिलिंग करके पृथ्वी की बाहरी परत यानी क्रस्ट को पार करना और उसके नीचे मौजूद मैंटल तक पहुंचना। वैज्ञानिकों का मानना था कि समुद्र के नीचे क्रस्ट अपेक्षाकृत पतली होती है, इसलिए वहां से मैंटल तक पहुंचना आसान होगा।

शुरुआती परीक्षण सफल रहे, लेकिन धीरे-धीरे इस परियोजना की लागत लगातार बढ़ती चली गई। राजनीतिक मतभेद, आर्थिक समस्याएं और तकनीकी कठिनाइयों के कारण यह महत्वाकांक्षी परियोजना अधूरी ही बंद करनी पड़ी। अमेरिका का सपना अधूरा रह गया। लेकिन जहां अमेरिका रुका, वहीं से सोवियत संघ ने अपनी तैयारी शुरू कर दी।

सोवियत वैज्ञानिकों ने फैसला किया कि वे समुद्र के बजाय जमीन से ही पृथ्वी के भीतर सबसे गहरा छेद बनाएंगे। कई वर्षों तक अलग-अलग स्थानों का अध्ययन किया गया। अंत में रूस के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित कोला प्रायद्वीप को चुना गया। यह इलाका आर्कटिक सर्कल के बेहद करीब था, जहां साल के अधिकांश समय बर्फ जमी रहती है, तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे पहुंच जाता है और चारों ओर वीरान चट्टानी मैदान फैले रहते हैं। 24 मई 1970 को आधिकारिक रूप से इस ऐतिहासिक परियोजना की शुरुआत हुई। इसका नाम रखा गया—कोला सुपरडीप बोरहोल, जिसे वैज्ञानिक भाषा में SG-3 भी कहा जाता है।

यह कोई साधारण गड्ढा नहीं था। इसका व्यास केवल लगभग 23 सेंटीमीटर यानी करीब 9 इंच रखा गया था। उद्देश्य चौड़ा गड्ढा बनाना नहीं, बल्कि धरती की गहराइयों तक पहुंचना था। वैज्ञानिकों का लक्ष्य था लगभग 15 किलोमीटर नीचे तक ड्रिलिंग करना। शुरुआती वर्षों में काम उम्मीद के मुताबिक आगे बढ़ता रहा। विशाल ड्रिलिंग रिग दिन-रात बिना रुके चट्टानों को काटती रही। हर कुछ सौ मीटर की गहराई से निकले पत्थरों के नमूनों को प्रयोगशालाओं में भेजा जाता, जहां उनकी उम्र, संरचना और रासायनिक गुणों का अध्ययन किया जाता था।

जैसे-जैसे ड्रिल नीचे जाती गई, वैसे-वैसे वैज्ञानिकों को करोड़ों वर्षों पुराने भूगर्भीय इतिहास की परतें खुलती दिखाई देने लगीं। ऐसा लगने लगा मानो धरती धीरे-धीरे अपना अतीत स्वयं वैज्ञानिकों के सामने खोल रही हो। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ किलोमीटर नीचे पहुंचने के बाद यह मिशन विज्ञान की सबसे कठिन चुनौतियों में बदल जाएगा।

शुरुआत में सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था, लेकिन लगभग सात किलोमीटर की गहराई पर पहुंचते-पहुंचते ऐसी घटनाएं सामने आने लगीं, जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वैज्ञानिकों के वर्षों पुराने अनुमान एक-एक करके गलत साबित होने लगे। धरती के भीतर का तापमान उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा था, चट्टानों का व्यवहार बदलने लगा था और ड्रिलिंग मशीनों पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा था। यहीं से शुरू होती है कोला सुपरडीप बोरहोल की सबसे रोमांचक कहानी—जहां विज्ञान को हर कदम पर नई चुनौती मिली, करोड़ों साल पुराने रहस्य सामने आए और आखिरकार वह कारण भी सामने आया, जिसकी वजह से दुनिया की सबसे गहरी खुदाई बीच रास्ते में ही रोकनी पड़ी।

दरअसल साल दर साल ड्रिलिंग का काम आगे बढ़ता गया। हर बीतते दिन के साथ ड्रिल कुछ मीटर और नीचे उतरती, लेकिन उसके साथ वैज्ञानिकों की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही थी। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ किलोमीटर नीचे पहुंचने के बाद पृथ्वी की संरचना ठीक वैसी ही मिलेगी, जैसी भूविज्ञान की किताबों में बताई जाती है। लेकिन धरती के भीतर छिपी दुनिया उनके हर अनुमान को एक-एक करके गलत साबित करने वाली थी।

करीब 7 किलोमीटर की गहराई तक पहुंचने के बाद वैज्ञानिकों को पहली बड़ी हैरानी हुई। दशकों से माना जाता था कि पृथ्वी की ऊपरी ग्रेनाइट परत के नीचे बेसाल्ट की मोटी परत होगी। यह सिद्धांत भूकंप की तरंगों के अध्ययन पर आधारित था और दुनिया भर की विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता था। लेकिन जब ड्रिल उस गहराई तक पहुंची, तो वहां बेसाल्ट की जगह फिर से ग्रेनाइट जैसी चट्टानें मिलीं। यानी जिस सीमा को वैज्ञानिक पृथ्वी की दो अलग-अलग परतों का विभाजन मानते थे, वह वास्तव में वैसी थी ही नहीं। इस खोज ने भूविज्ञान की कई पुरानी धारणाओं पर सवाल खड़े कर दिए।

इसके बाद वैज्ञानिकों को एक और ऐसी चीज मिली, जिसने उन्हें और भी ज्यादा हैरान कर दिया। करीब 6 से 7 किलोमीटर की गहराई से निकाले गए पत्थरों में सूक्ष्म समुद्री जीवों के जीवाश्म मिले। ये इतने छोटे थे कि उन्हें केवल माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता था। जांच में पता चला कि ये जीव लगभग दो अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर मौजूद थे। सबसे बड़ा सवाल यह था कि समुद्र में रहने वाले जीव इतने नीचे कैसे पहुंच गए?

वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि करोड़ों वर्षों पहले पृथ्वी की सतह पर हुए भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण ये चट्टानें धीरे-धीरे नीचे दबती चली गईं और आज इतनी गहराई पर मौजूद हैं। यह खोज पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास को समझने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। लेकिन धरती अभी और भी रहस्य छिपाए बैठी थी। वैज्ञानिकों का मानना था कि इतनी गहराई पर पानी का कोई अस्तित्व नहीं होगा। इतनी अधिक गर्मी और दबाव में पानी लंबे समय तक टिक ही नहीं सकता। लेकिन जब गहराई बढ़ी, तो चट्टानों की महीन दरारों से पानी मिलने लगा।

यह सामान्य भूजल नहीं था। माना गया कि यह पानी चट्टानों में मौजूद खनिजों से करोड़ों वर्षों में बनी रासायनिक प्रक्रियाओं का परिणाम था। इस खोज ने यह साबित कर दिया कि पृथ्वी के भीतर होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल हैं। ड्रिलिंग के दौरान एक और अजीब घटना बार-बार देखने को मिली। गहराई से हाइड्रोजन गैस निकलने लगी। कई बार यह गैस ड्रिलिंग में इस्तेमाल होने वाले द्रव के साथ मिलकर बुलबुले बनाने लगती थी। पहली नजर में ऐसा लगता था मानो नीचे कुछ उबल रहा हो। हालांकि वैज्ञानिकों ने बाद में स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह प्राकृतिक भू-रासायनिक प्रक्रिया थी। जैसे-जैसे ड्रिल नीचे जाती गई, तापमान तेजी से बढ़ने लगा। वैज्ञानिकों का अनुमान था कि 12 किलोमीटर की गहराई पर तापमान लगभग 100 डिग्री सेल्सियस होगा, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग निकली। वहां तापमान लगभग 180 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका था।

यह तापमान इतना अधिक था कि नीचे की चट्टानें पूरी तरह ठोस रहने के बजाय नरम और लचीली होने लगीं। उन्हें काटना पहले की तुलना में कई गुना कठिन हो गया। ड्रिल बिट बार-बार फंसने लगी और मशीनों के खराब होने की घटनाएं बढ़ने लगीं। इसके बावजूद सोवियत वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अधिक मजबूत धातुओं से बने नए ड्रिल बिट तैयार किए, मशीनों में बदलाव किए और कई बार पूरी ड्रिलिंग तकनीक तक बदलनी पड़ी। लेकिन धरती का बढ़ता तापमान हर बार उनकी नई योजना को चुनौती दे देता।

फिर आया साल 1984 यह इस पूरे मिशन का सबसे बड़ा झटका था। करीब 12 किलोमीटर की गहराई पर काम करते समय ड्रिल पाइप का एक लंबा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर गया। लगभग पाँच किलोमीटर लंबा उपकरण गड्ढे के भीतर ही फंस गया। उसे बाहर निकालने की हर कोशिश नाकाम रही। अब वैज्ञानिकों के सामने केवल दो रास्ते थे—या तो पूरी परियोजना बंद कर दी जाए, या फिर कुछ ऊपर से नई दिशा में दोबारा ड्रिलिंग शुरू की जाए, उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

कई महीनों तक नई शाखा तैयार की गई और फिर उसी स्थान से दोबारा खुदाई शुरू हुई। इसमें वर्षों का अतिरिक्त समय लगा, लेकिन वैज्ञानिकों का लक्ष्य अब भी वही था—धरती के भीतर जितना संभव हो, उतना आगे बढ़ना, आखिरकार 1989 में इतिहास रच दिया गया। ड्रिल 12,262 मीटर, यानी 12.262 किलोमीटर की रिकॉर्ड गहराई तक पहुंच गई। यह मानव इतिहास का सबसे गहरा कृत्रिम गड्ढा बन गया। आज, तीन दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी दुनिया का कोई दूसरा बोरहोल इस रिकॉर्ड को नहीं तोड़ पाया है। लेकिन इस रिकॉर्ड के साथ ही एक और कहानी जन्म लेने वाली थी।

कुछ वर्षों बाद पूरी दुनिया में यह अफवाह फैल गई कि वैज्ञानिकों ने इस गड्ढे में माइक्रोफोन उतारा और वहां से हजारों लोगों की चीखें सुनाई दीं। देखते ही देखते यह खबर अखबारों, पत्रिकाओं और बाद में इंटरनेट पर फैल गई। लोगों ने इसे "नर्क का दरवाजा" कहना शुरू कर दिया। 

साल 1989 में जब कोला सुपरडीप बोरहोल ने 12.262 किलोमीटर की रिकॉर्ड गहराई हासिल की, तब पूरी दुनिया की नजर इस परियोजना पर थी। वैज्ञानिकों ने भले ही एक नया रिकॉर्ड बना लिया था, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—इससे भी अधिक गहराई तक पहुंचना।

उनका अंतिम लक्ष्य लगभग 15 किलोमीटर तक ड्रिलिंग करना था। लेकिन धरती के भीतर का तापमान हर मीटर के साथ उनकी उम्मीदों को तोड़ रहा था।

12 किलोमीटर से अधिक गहराई पर तापमान लगभग 180 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका था। इतनी गर्मी में लोहे के मजबूत ड्रिल बिट भी तेजी से घिसने लगे। नीचे मौजूद चट्टानें इतनी कठोर नहीं थीं, जितनी वैज्ञानिकों ने कल्पना की थी। अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण वे धीरे-धीरे नरम होकर प्लास्टिक जैसी बनने लगी थीं। परिणाम यह हुआ कि ड्रिल बार-बार फंसने लगी और मशीनों को ऊपर निकालना बेहद कठिन हो गया।

वैज्ञानिकों ने कई नई तकनीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने मजबूत मिश्रधातुओं से बने उपकरण तैयार किए, ड्रिलिंग की गति बदली और मशीनों में सुधार किए। लेकिन प्रकृति हर बार उनसे एक कदम आगे निकल जाती थी। फिर 1991 में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी परियोजना की दिशा बदल दी। सोवियत संघ का विघटन हो गया।

जिस देश ने इस महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक परियोजना को शुरू किया था, वही देश अब अस्तित्व में नहीं रहा। नई रूसी सरकार के सामने आर्थिक संकट था। वैज्ञानिक परियोजनाओं के लिए बजट में भारी कटौती की गई और कोला सुपरडीप बोरहोल भी इससे अछूता नहीं रहा। एक तरफ तकनीकी समस्याएं थीं, दूसरी तरफ पैसों की कमी। आखिरकार वैज्ञानिकों ने स्वीकार कर लिया कि मौजूदा तकनीक से इससे अधिक गहराई तक जाना संभव नहीं है।

1992 में इस परियोजना को आधिकारिक रूप से रोक दिया गया और कुछ वर्षों बाद पूरा रिसर्च स्टेशन भी बंद कर दिया गया। धीरे-धीरे वहां काम करने वाले वैज्ञानिक दूसरी परियोजनाओं में चले गए। विशाल ड्रिलिंग मशीनें हटा दी गईं। प्रयोगशालाएं खाली हो गईं और कभी हजारों लोगों की गतिविधियों से भरा रहने वाला यह परिसर वीरान हो गया।

आज यदि कोई उस स्थान पर जाता है, तो उसे टूटी हुई इमारतें, जंग लगे लोहे के ढांचे और बर्फ से ढका एक सुनसान इलाका दिखाई देता है। लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है जमीन पर लगी एक गोल धातु की प्लेट, जिसे मजबूत बोल्टों से बंद किया गया है। इसी प्लेट के नीचे मौजूद है दुनिया का सबसे गहरा मानव निर्मित छेद। लेकिन इसी के साथ जन्म लेती है वह कहानी, जिसने इस वैज्ञानिक परियोजना को रहस्य और डर की दुनिया से जोड़ दिया।

1990 के दशक की शुरुआत में कुछ विदेशी अखबारों और धार्मिक प्रकाशनों में यह दावा किया गया कि वैज्ञानिकों ने बोरहोल के भीतर एक विशेष माइक्रोफोन उतारा था। कहा गया कि नीचे से हजारों लोगों के चिल्लाने और दर्द से चीखने की आवाजें रिकॉर्ड हुईं। कुछ रिपोर्टों में तो यहां तक लिखा गया कि वैज्ञानिकों ने घोषणा कर दी थी कि उन्होंने "नर्क का दरवाजा" खोज लिया है। यह खबर धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गई। 

इंटरनेट आने के बाद यह कहानी और भी तेजी से वायरल हुई। कई वीडियो बनाए गए, जिनमें डरावनी आवाजें सुनाई जाती थीं। दावा किया जाता था कि यही आवाजें कोला सुपरडीप बोरहोल से रिकॉर्ड की गई हैं। लेकिन जब पत्रकारों और वैज्ञानिकों ने इसकी जांच की, तो सच्चाई बिल्कुल अलग निकली। सबसे पहले, इतनी गहराई और लगभग 180 डिग्री सेल्सियस तापमान में उस तरह का सामान्य माइक्रोफोन काम ही नहीं कर सकता था। दूसरा, इस परियोजना में काम करने वाले किसी भी वैज्ञानिक ने कभी ऐसी रिकॉर्डिंग होने की पुष्टि नहीं की। बाद में पता चला कि इंटरनेट पर वायरल हुई तथाकथित "चीखों" की ऑडियो किसी हॉलीवुड फिल्म और साउंड इफेक्ट्स से मिलाकर बनाई गई थी। यानी जिस कहानी को वर्षों तक लोग सच मानते रहे, वह वास्तव में केवल एक अफवाह थी।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि यह परियोजना साधारण थी। कोला सुपरडीप बोरहोल ने विज्ञान को ऐसे तथ्य दिए, जिन्होंने पृथ्वी के बारे में हमारी समझ बदल दी। इस परियोजना ने साबित किया कि पृथ्वी की संरचना हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल है। यहां मिली चट्टानों, खनिजों, सूक्ष्म जीवाश्मों और तापमान से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक करते हैं। यह परियोजना भले ही अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि इंसान की जिज्ञासा किसी भी सीमा से बड़ी होती है। कभी वह समुद्र की गहराइयों में उतरता है, कभी अंतरिक्ष की अनंत दूरी तय करता है और कभी अपने ही ग्रह के भीतर छिपे रहस्यों को समझने की कोशिश करता है।

आज भी कोला सुपरडीप बोरहोल का 12.262 किलोमीटर गहरा छेद उसी तरह धरती के भीतर मौजूद है। उसके ऊपर लगा धातु का ढक्कन मानो हमें याद दिलाता है कि विज्ञान ने यहां तक तो पहुंचने में सफलता हासिल कर ली, लेकिन पृथ्वी के भीतर अभी भी ऐसे अनगिनत रहस्य छिपे हैं, जिन्हें समझना बाकी है। शायद आने वाले वर्षों में नई तकनीक विकसित होगी, नए वैज्ञानिक इस अधूरे मिशन को फिर से शुरू करेंगे और इंसान एक दिन धरती की उन गहराइयों तक भी पहुंच जाएगा, जहां आज तक कोई नहीं पहुंच सका।

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