थप्पड़-मुक्कियों से हो रहा लोकतंत्र पर हमला

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लोकतंत्र आधुनिक और मानववादी मूल्यों की राजनीतिक प्रणाली है जहां स्थानीय सत्ता से राज्य सत्ता तक समाज का नेतृत्व करने वाले आमजन ही देश चलाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। वशानुंगत या राजशाही शासन प्रणाली अब नहीं रही। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों व लोक सभा चुनावों को देखें तब नेतृत्व करने वाले आम आदमी के विरुद्ध यह दौर बदमिजाजी, अशिष्ट व्यवहार व असहनशीलता का बन गया है।

चुनावी प्रचार में घटिया से घटिया शब्दावाली व हरकतें टीवी चैनलों पर आम देखने-सुनने को मिलती हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को एक बार फिर चुनावी रैली के दौरान एक व्यक्ति ने थप्पड़ मारने की कोशिश की। मतभेद व विरोध होना स्वाभाविक है लेकिन थप्पड़ मारकर अपनी भड़ास निकालना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकृत विरोध नहीं। इससे उलटे ऐसा प्रतीत होता है कि देश अभी भी कबीलाई युग से गुजर रहा हो। देश में स्वाधीनता संग्राम के नेताओं की मूर्तियों का अपमान किया जाता है, मंचों, सभाओं में नेताओं पर थप्पड़, मुक्कियों के हमले, सोशल मीडिया में भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती हैं और विरोध के भी अजीब-अजीब सनसनीखेज तरीके देखने-सुनने को मिल रहे हैं।

कोई पार्टी पुलवामा हमले पर सवाल उठा रही है और कोई मुंबई के 26/11 हमले को फिक्स हमला बता रही है। दस साल पूर्व घटी घटनाओं को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे कोई घटना कल ही घटी है और उसमें साजिश देश के ही नेताओं की है। बिना किसी सबूत व आधार के सोशल मीडिया पर देश में अफवाहों को फैलाया जा रहा है। धर्मों के नाम पर वोटरों को बांटने के लिए नेता कोई मौका नहीं चूक रहे। मंदिर-मस्जिद के नाम पर भड़काऊ बयान दिए जा रहे हैं, जिस पर चुनाव आयोग सख्त नोटिस ले रहा है लेकिन कोई भी पार्टी अपने नेता को जिम्मेदारी से बोलने का आदेश नहीं दे रही। हर राजनीतिक पार्टी अपने नेता के विवादित बयान को उसका निजी बयान बता कर पल्ला झाड़ लेती है लेकिन जो जहर समाज में फैल जाता है उसकी जिम्मेदारी से हर पार्टी भागती है।

 धार्मिक सद्भावना कायम रखने का दावा करने वाली पार्टियों के वरिष्ठ नेता विवादित बयान देने वालों को पार्टी से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाते? दरअसल पार्टियों को केवल जीत चाहिए, जिसके लिए वह समाज को भी मुसीबत में डालने से नहीं कतराती। लोकतंत्र एक जमाने में राजतंत्र के खिलाफ आम लोगों की आवाज थी, जो अब सत्ता हथियाने तक सीमित रह गया है। लोकतंत्र जहां राजशाही, अधिनायकशाही की बुराइयों के विरोध में अस्तित्व में आया था अब उससे भी बढ़कर बुराइयां लोकतंत्र का अस्त्र बन गई हैं। वोटर की जागरूकता ही लोकतंत्र को बचा सकती है अन्यथा थप्पड़-मुक्कियों के बहाने अराजक लोगों ने सत्ता को धमकाना शुरू कर दिया है जो किसी भी सूरत में सहन नहीं होना चाहिए।

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