लोकतंत्र में शब्दों की गिर रही गरिमा

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लोक सभा चुनावों को लेकर वाकयुद्ध तेज हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान रोजमर्रा ही चर्चा का विषय बन रहे हैं। भाषा व शिष्टाचार का स्तर गिरता जा रहा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनैतिक बयानबाजी व सरगर्मियों को देखकर ऐसा लगता है कि यहां 70 सालों के बाद लोकतंत्र अभी भी अपने बचपन से गुजर रहा है। लोकतंत्र के सैद्धांतिक व व्यवहारिक रूप में न केवल बहुत बड़ा अंतर ही है बल्कि इनका आपस में कोई तालमेल भी नजर नहीं आ रहा। राजनेताओं ने कटु शब्दों, व्यंग्यों, अभद्र भाषा को ही लोकतंत्र समझ लिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने विरोधी पार्टियों के लिए महामिलावटी शराब जैसे शब्द इस्तेमाल किए हैं

जो उनके कद व उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान से बिल्कुल मेल नहीं खाते। प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी गतिविधियों में वह भाजपा के नेता अधिक व देश के प्रधानमंत्री के तौर पर कम नजर आ रहे हंै। वह अपनी, रैलियों में कांग्रेस व अन्य विरोधियों पर प्रहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। विरोधियों की अलोचना का उनको पूरा अधिकार है लेकिन देश के किसी एक ही नेता का निंदा प्रचार करते रहना लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है।

दरअसल सत्ता पक्ष का मुख्य काम सरकार के पांच सालों के कार्यकाल की उपलब्धियों को बताना होता है। सरकार की उपलब्धियां ही विरोधी पक्ष के हर सवाल या हमले का जवाब होती हैं, लेकिन कांग्रेस व भाजपा दोनों की शब्दावली विरोधी पक्ष में वैर विरोध वाली बन गई है। इधर कांग्रेस भी चौकीदार चोर का नारा लेकर चल रही है। कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री के पद के लिए इस्तेमाल किए जा रहे शब्द स्तरहीन हैं। भाजपा के नेता भी गांधी परिवार के लिए घटिया शब्दावली प्रयोग कर रहे हैं जो आलोचना की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

इसी तरह भाजपा द्वारा 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए भी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया, जब राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का यह हाल है तो राज्य व जिला स्तरीय नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है। यदि यही हाल रहा तब भविष्य की पीढ़ी को राजनीति में चोर, डाकू, धोखेबाज, लुटेरे, देशद्रोही जैसे शब्द ही विरासत में मिलेंगे। नि:संदेह देश का राजनैतिक ढांचा लगातार गिरावट की तरफ जा रहा है जहां सत्ता के लिए घटिया से घटिया प्रपंच लोकतंत्र के मूल्यों से ऊपर हो गया।

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