बाढ़ की मार: प्राकृतिक आपदा / लापरवाही

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पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य पानी की किल्लत का सामना कर रहे थे। पिछले कई दिनों से पंजाब समुन्द्र बना हुआ है और हरियाणा का कुछ भाग बाढ़ की चपेट में है। हरियाणा में यमुना नदी के किनारे बसे 60 गांव बाढ़ के पानी में डूब चुके हैं। बाढ़ की भयानकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई लोगों को हैलीकाप्टर के द्वारा सुरक्षित निकाला गया। केवल फसलों या मकानों की तबाही समस्या नहीं बल्कि पीने वाले पानी और यातायात रूक जाने के कारण लोग बेहाल हैं।

पंजाब में सतलुज नदी में आई बाढ़ के कारण भारी नुक्सान हुआ है। जिला रूपनगर से लेकर फिरोजुपर में पाक के साथ सटी सीमा तक तबाही का मंजर है। सरकार के हमदर्दी और राहत कार्य संतोषजनक हैं। सरकार के साथ-साथ समाज सेवी संस्थाएं भी पूरा सहयोग कर रही हैं लेकिन बाढ़ के कारणों पर भी सवाल उठ रहे हैं। लोग बाढ़ को प्राकृतिक आपदा मानने के लिए तैयार नहीं। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड ( बीबीएमबी) से लेकर पंजाब सरकार के ड्रेनेज विभाग के कार्य पर सवाल उठ रहे हैं।

बीबीएमबी ने दलील दी है कि 24 घंटों में होने वाली बारिश का केवल 4 घंटों में होना फ्लड गेट खोले जाने का बड़ा कारण है लेकिन इस बात पर भरोसा करना कठिन है क्योंकि जब 15 दिन पहले ही केरल, कर्नाटक, महानगर उत्तरप्रदेश जैसे राज्य बाढ़ की चपेट में आए हुए हैं तब बीबीएमबी को मौसम के मद्देनजर तैयार रहकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए थी दूसरी तरफ पंजाब के ड्रेनेज विभाग द्वारा ड्रेनों की सफाई न करने के आरोप लग रहे हैं।

वर्षा प्राकृतिक देन है लेकिन मौसम के मद्देनजर जब कोई विभाग अपनी सरकार द्वारा जारी हिदायतें की पालना नहीं करता तब इसे लापरवाही के कारण हुआ नुक्सान माना जाता है। अब सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि घर छोड़ चुके लोगों तक डाक्टरी टीमें समय पर भेजी जाए। लोगों को फसलों और मकानों के नुक्सान का योग्य मुआवजा दिया जाए। पिछले कुछ समय में यही होता आया है कि राजनैतिक रसूख वाले पीड़ितों के घर नुक्सान के पूरे-पूरे चैक पहुंच जाते थे और आम किसानों को प्रति एकड़ 300-400 रुपए ही मिलते थे। फसलों की तबाही प्राकृतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक कमजोरियों का भी परिणाम है इसीलिए मुआवजा राशि में विस्तार कर फसल की पूरी कीमत दी जानी चाहिए।

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