चीन सरकार ने विश्व में कोविड-19 के हॉटस्पाट अपने शहर वुहान में हुई मौतों के नए आंकड़े जारी किए हैं। नई रिपोर्ट के अनुसार वुहान में 4632 लोगों की मौत हुई हैं जबकि पहली रिपोर्ट में मृतकों की गिनती 1290 से कम बताई गई थी। चीन भले ही वास्तविक्ता को बताने का दावा कर रहा है और तथ्य भी पेश कर रहा है लेकिन इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के प्रति अन्य देशों की शंकाएं बढ़ी हैं। हाल ही में जारी रिपोर्ट से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा भी सच साबित हुआ है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन कोविड-19 की वास्तविक्ता को छुपा रहा है और इसकी जानकारी भी देरी से दी है। केवल अमरीका ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी यह धारणा बन रही थी कि चीन अपने मृतकों की गिनती सही नहीं बता रहा। चीन सरकार का मीडिया पर कठोर नियंत्रण होने की चर्चाएं भी इस धारणा का आधार बन रही थीं। चीन के आंकड़ों में जितना बड़ा अंतर सामने आया है इसके पीछे बताए जा रहे तर्क साधारण बुद्धि वाले व्यक्ति को भी हजम नहीं हो सकते।
यदि भारत जैसे विकासशील देश में कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीजों, पुष्टि वाले मरीजों, मौतों की संख्या, ठीक हुए मरीजों की संख्या का पल-पल ऑनलाइन आंकड़ा आम लोगों तक पहुंचा रहा है तब चीन इस मामले में कैसे पिछड़ सकता है? भारत में किसी व्यक्ति के मरने के बाद भी उसकी मेडिकल रिपोर्ट का रिकार्ड मौजूद है। कई मरीजों के मरने के बाद इस बात की पुष्टि हुई कि वह वायरस से पीड़ित था, फिर चीन जैसा देश जो 20 दिनों में 10 हजार बैड का अस्पताल बना सकता है वह वायरस से पीड़ितों व मृतकों का पूरा डाटा नहीं रख सकता, क्यों? जो देश खुले मैदानों में तंबूओं के आधुनिक व सुरक्षित अस्पताल बना सकता है वहां मरीजों के टेस्टों के प्रति इतनी बड़ी लापरवाही की संभावना न के बराबर है। चीन में जिस तरह से मरीजों के आंकड़ें नैटवर्क के साथ नहीं जुड़ पाए और निजी अस्पतालों द्वारा पूरी जानकारी नहीं देने की बातें की हैं, यह यह किसी गरीब या पिछड़े देश की तस्वीर लगती है। चीन की बदल रही रिपोर्टस उसके अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों के साथ संबंध बिगड़ने का कारण बन सकती है। इस वक्त मानवता को निगल रही महामारी की जानकारी देने में राजनीति की बू बड़ा संकट पैदा कर सकती है।