न खाऊंगा, न खाने दूंगा

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प्रधानमंत्री नरिन्दर मोदी का यह नारा एक जुमला बनकर रह गया है। उत्तर प्रदेश के तीन मंत्रियों के निजी सचिव एक स्टिंग आॅप्रेशन में रिश्वत लेते हुए पकडेÞ गए। जब एक मंत्री के सचिव का यह चरित्र होगा, तब उनके नीचे काम करने वाले अधिकारी भला कैसे रिश्वतखोरी से बच सकेेंगे। नेशनल हाईवे निर्माण के कार्यों में करोड़ों रुपए के घोटाले सामने आ रहे हैं। इनसे संबंधित 15 मामलों में 7 मामले उतर प्रदेश, बिहार व महाराष्टÑ से जुड़े हुए हैं। इन राज्यों में भाजपा की ही सरकार है। आधी दर्जन के करीब अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही चल रही है। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार से चुनावों में भ्रष्टाचार व रिश्वत को खत्म करने का दावा किया था उसकी हवा उनकी पार्टी की सरकार वाले राज्यों ने ही निकाल कर रख दी।

यूं भी आम जनता केवल मंत्रियों या उनके सचिवों के भ्रष्ट होने से दुखी नहीं बल्कि क्लर्क से लेकर बड़े अधिकारियों तक कागज पूरे होने के बावजूद अपनी फाइल पास करवाने के लिए लोगों को रिश्वत देनी पड़ रही है। यही हाल हरियाणा में भी है जहां सीएम विंडो की सुविधा देकर लोगों की शिकायत दूर करने की शुरूआत की गई लेकिन अब भ्रष्टाचार इस स्तर पर पहुंच चुका है कि आम लोगों को काम करवाने के लिए सिफारिश व रिश्वत का सहारा लेना पड़ रहा है। गली के सीवरेज से लेकर बिजली का खंभा लगवाने तक भी अधिकारी कोई सुनवाई नहीं करते।

जब ईमानदार विधायक/सांसद मंत्री लोगों की समस्याएं सुनकर कर्मचारियों व अधिकारियों को लताड़ नहीं लगाएंगे तब तक सुधार संभव नहीं किंतु हालात यह हैं कि सत्तापक्ष व विपक्ष दोनों के पास जनता से संपर्क साधने की फुर्सत तक नहीं। दोनों पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त रहते हैं। विपक्ष सत्तापक्ष के खिलाफ कोई मुद्दा उठाता है तो उस मुद्दे की दही निकालते हुए चार पांच साल निकल जाते हैं। कुछ मीडिया संस्थानों ने भी सत्तापक्ष व विपक्ष की बेमतलब लंबी बहस की परंपरा को छेड़ दिया है। लोगों की समस्याएं इन बहसों में गायब हो रही हैं।

जनता को आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बल्कि अपनी समस्याओं से निजात पाने व सुविधाओं की जरूरत है। सीबीआई व ईडी जैसी संस्थाओं का प्रयोग भी विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है। जनता नेताओं की इस लड़ाई में मूकदर्शक बनकर रह गई है। सत्तापक्ष के नेता यदि किसी कानूनी पेंच में फंस भी जाते हैं तो उस मामले को दबाने के लिए कई सौ तरीके अपनाए जाते हैं। पुलिस कार्यवाही को इस प्रकार फिल्मी तरीके से बदल दिया जाता है कि जज यहां तक कह जाते हैं कि सबूतों के आभाव में वह असली दोषियों को सजा न देने के लिए बेबस है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त व निष्पक्ष कार्यवाही आवश्यक है, लेकिन केवल कहने भर नहीं बल्कि उसे व्यवहारिक बनाया जाना चाहिए।

 

 

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