चुनावी वायदों में बढ़ रही योजना रहित धनवर्षा

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गत दिवस तीन खबरों ने खूब सुर्खियां बटोरी और लोगों का ध्यान भी खींचा। पहली खबर मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने विधान सभा चुनावों के लिए अपना मैनीफैस्टो ‘वचन-पत्र’ के शीर्षक से जारी किया, दूसरी खबर छत्तीसगढ़ में भाजपा ने अपना मैनीफैस्टो ‘संकल्प-पत्र’ के नाम से पेश किया। तीसरी खबर हरियाणा से यह थी कि 18 हजार के करीब नौकरियों के लिए 17 लाख उम्मीदवारों ने लिखित परीक्षा दी। हरियाणा की भाजपा सरकार ने भी सत्ता में आने से युवाओं को रोजगार देने का वायदा किया था लेकिन कितनों को रोजगार मिला यह उम्मीदवारों की संख्या बता रही है। मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-भाजपा के मैनीफैस्टो भी किसी नीति या आर्थिक विशेषज्ञों की दिमागी कसरत का परिणाम नहीं बल्कि लोक लुभावने वायदे हैं, जिसका उद्देश्य वोट बटोरना है।

वास्तव में तो यह वायदे पूरे ही नहीं होते। राज्य के आर्थिक हालातों के अनुसार वायदे पूरे करने भी मुश्किल होते हैं। यदि इन वायदों में से कुछेक पूरे भी होते हैं फिर भी इसे योजनाबद्ध, संतुलित व वैज्ञानिक विकास नहीं कहा जा सकता। एक वायदा पूरा करने के लिए प्रदेश सरकार का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है और दूसरे वायदे को तो पूरा करने के लिए सरकार सोचने लायक भी नहीं रहती। फिर कई वायदों को किश्तों में पूरा किया जाता है, जैसे हरियाणा में बुढ़ापा पैंशन बढ़ा दी गई।

पंजाब की कांग्रेस सरकार किसानों का कर्ज कई पड़ावों में पूरा कर रही है। अधिकतर वायदे नेताओं को याद भी नहीं रहते कि वह वायदा उन्होंने किया भी था। दरअसल हमारे देश के आर्थिक ढांचें के बिगड़ जाने का बड़ा कारण वोट बैंक की नीति है। चुनावों के समय यह देखा जाता है कि कौन सा तीर चलेगा। पिछले सालों से किसानों के कर्ज का मुद्दा छाया हुआ है। पंजाब में इसी मुद्दे ने कांग्रेस को सत्ता में बिठाया, यही फार्मूला मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा भी अजमाना चाहती है। हरियाणा में इनेलो भी पंजाब की तर्ज पर किसानों के साथ वायदे कर रही है। इस बार पत्रकार व वकीलों का वर्ग भी शामिल कर लिया गया है।

नि:संदेह राजनीति देश की आर्थिकता सहित बहुपक्षीय नेतृत्व करती है। आर्थिक विशेषज्ञ तो सरकार रूपी किश्ती के चप्पू होते हैं लेकिन चप्पू को एक तरफ रखकर किश्ती चलाना असंभव होता है। देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार किस तरह की आर्थिक नीतियों को कितनी जिम्मेदारी व गंभीरता से लागू करती व आर्थिक विशेषज्ञों की सेवाओं का लाभ उठाती है। परंतु हकीकत कुछ ओर है यहां राजनैतिक घोषणाओं के शोर तले आर्थिक सिद्धांत धरे धराए रह जाते हैं।

राजनैतिक नेताओं व अर्थ शास्त्रीयों के बीच अंतर कायम रखना ही होगा, नहीं तो नोटबन्दी पर सवाल तो उठ ही रहे हैं। राजनेता देश के मुद्दों को गंभीरता व तत्परता से समझें और उनका समाधान करने के लिए सबंधित विशेषज्ञों की सलाह व मार्ग दर्शन लें, तीर-तुक्कों से देश नहीं चलता।

 

 

 

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