राजनीति में पद की बजाय सेवा को अपनाएं नेता

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ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने अशोक गहलोत व सचिन पायलट के मामले से सबक लेकर अनुशासन को ही सफलता का मंत्र बना लिया है। राजस्थान में पायलट के बागी तेवरों को पार्टी हाईकमान ने नामंजूर कर सख्त फैसला लिया था और उन्हें पार्टी के अध्यक्ष और उप-मुख्यमंत्री के पद से निलंबित कर दिया। हाईकमान ने यही फैसला पंजाब में दोहराया। गत दिवस किसानों के समर्थन में राहुल गांधी की ट्रैक्टर रैली से पहले यह चर्चा छिड़ गई थी कि नाराज विधायक नवजोत सिंह सिद्धू को मनाने के लिए कांग्रेस पंजाब का पार्टी अध्यक्ष या उप-मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकती है लेकिन ट्रैक्टर रैली दौरान सिद्धू ने अपने जोशीले अंदाज में भाषण दिया और उन्होंने पार्टी में अनदेखी करने पर बिना नाम लिए पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ अपनी भड़ास भी निकाली। उनके तेवर पार्टी को रास नहीं आए।

राहुल गांधी के साथ ट्रैक्टर पर जगह न मिलने पर भी सिद्धू रूठ गए थे और कांग्रेस के पंजाब इंचार्ज हरीश रावत उन्हें मनाकर लाए। अगले प्रोग्राम में सिद्धू ने भाग ही नहीं लिया। अगले ही दिन हरीश रावत ने स्पष्ट कर दिया कि सिद्धू के लिए अभी पार्टी में कोई सीट (प्रधान या उप-मुख्यमंत्री) खाली नहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञ रावत के इस बयान को सिद्धू के व्यवहार प्रति हाईकमान की नाराजगी बता रहे हैं। भले ही कांग्रेस लोकसभा चुनाव 2019 में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी लेकिन मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्या सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट के मामले से बहुत कुछ सीखा है। कांग्रेस पुराने अनुभवी व नए नेताओं के बीच एक तालमेल बनाने की रणनीति बनाकर चल रही है।

कांग्रेस किसी नेता के सामने पूरी पार्टी को झुकने की रणनीति नहीं चलने दे रही। नि:संदेह यूथ किसी पार्टी का अभिन्न अंग होते हैं लेकिन कोई भी नेता मुद्दों और सिद्धांतों से बड़ा नहीं हो सकता। अनुशासन किसी भी संस्था या पार्टी के लिए आवश्यक होता है। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के साथ-साथ मर्यादा की भी सीमाएं होती हैं जो आगे चलकर सिद्धांतों के साथ बंधी होती हैं। योग्यता के बल पर कोई भी नेता कहीं भी पहुंच जाता है लेकिन केवल पदों के लिए रूठों को मनाना भी अच्छा संकेत नहीं। राजनीति को सेवा बनाने के लिए मर्यादा भी मजबूत बनानी होगी।

 

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