संघर्ष तो लोगों को करना ही पड़ेगा

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लोक सभा चुनाव में पार्टियां भले ही जनता के कल्याण के जितने मर्जी वायदे या दावे करें लेकिन यह सच है कि जनता को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ रही है। पंजाब में लोक सभा चुनाव के लिए राजनैतिक गतिविधियां जोरों पर हैं। इस राजनैतिक मैदान में लोग शराब के खिलाफ अपनी आवाज खुद बुलंद कर रहे हैं। कई गांवों से शराब के ठेके उठवाने के लिए ग्रामीण धरने दे रहे हैं। लोगों की जोरदार मांग के बावजूद कोई भी राजनैतिक पार्टी लोगों के समर्थन में खड़ी होने के लिए तैयार नहीं। विपक्ष भी ठेकों के खिलाफ सत्ता में मौजूद कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाने के लिए तैयार नहीं। मालवा के सैकड़ों गांवों की पंचायतें भी शराब के खिलाफ प्रस्ताव दे चुकी हैं लेकिन किसी न किसी तकनीकी रूकावट के बहाने आबकारी विभाग पंचायतों के प्रस्ताव रद्द करता आ रहा है।

कांग्रेस ने विधान सभा चुनावों में अपने वायदा पत्र में प्रदेश में से हर साल 5 प्रतिशत शराब के ठेके खत्म करने का वायदा किया था लेकिन शराब के ठेके तो क्या घटने थे उल्टा शराब का कोटा बड़ा दिया गया। सरकार शराब से होने वाली कमाई का लोभ छोड़ने के लिए तैयार नहीं। अकाली भाजपा सरकार के समय में भी शराब का कोटा लगातार बढ़ाया गया, तब भी सरकार लाखों रुपए के विज्ञापन जारी कर शराब की बढ़ रही कमाई को अपनी उपलब्धि गिनाती रही।

दरअसल सरकारी खजाने में 5 हजार करोड़ की रकम डालने के लिए सरकार लोगों के स्वास्थ्य की कुर्बानी देने के लिए तैयार है। शराब के कारण सड़क हादसे, लड़ाई-झगड़े और कई अन्य अपराध भी बढ़ रहे हैं। फिर भी सरकार के पास पता नहीं कौन सी जादू की छड़ी है कि वह शराब की खपत को बढ़ाकर प्रदेश का कल्याण करना चाहती है? शराब व चूरा पोस्त के लिए ही पंजाब बदनाम हो चुका है। शराब के कारण पंजाबी लोग सामाजिक और मानसिक तौर पर कमजोर हुए हैं।

राजनैतिक पार्टियों को चुनावों के समय शराब एक हथियार की तरह काम देती है, फिर नेताओं को क्या जरूरत है लोगों के शराब विरोधी धरनों में शामिल होने की। सरकारों की नशों के प्रति दोहरी नीतियां समाज को बर्बाद कर रही हैं लेकिन यह सामाजिक गिरावट किसी भी पार्टी के एजेंडे में शामिल नहीं शराब सरकार के लिए नशा ही नहीं है इसीलिए शराब के मामले में लोगों को अकेले ही जंग लड़नी होगी। लोकतंत्र का तात्पर्य शायद यही हो गया कि लोगों की समस्याएं, लोगों के लिए और लोगों द्वारा ही हल की जाएंगी।

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