लोकतंत्र में हिंसा का कोई काम नहीं

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पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनावों से पूर्व हिंसा का खतरा बनना चिंताजनक व शर्मनाक है। यह राज्य न तो कश्मीर की तरह आतंकवाद से प्रभावित है और न ही नक्सली हिंसा की कोई समस्या है लेकिन राजनीतिक हिंसा का खतरा इतना ज्यादा मंडरा रहा है कि भाजपा के प्रदेश इंचार्ज कैलाश विजयवर्गीय को जैड सुरक्षा के साथ बुलेट प्रूफ गाड़ी देनी पड़ी है। ऐसे हालात लोकतंत्र की परिभाषा को कमजोर करते हैं। यदि वरिष्ठ नेताओं को किसी बड़े खतरे की संभावना है तो उस वक्त क्या होगा जब दो गुटों के हिंसक माहौल में वोटर पोलिंग बूथ पर वोट डालने जाएंगे।

चुनाव लोकतंत्र की आत्मा है, जिसमें वोटर स्वतंत्र व सुरक्षित है। जब कोई वोटर बिना भय के वोट ही नहीं डाल सकेगा, तब लोकतंत्र की कल्पना करना मुश्किल होगा। ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेवारी पर सवाल उठना स्वभाविक है कि वह अमन-शांति क्यों नहीं बहाल कर सकी। इसमें कोई संदेह नहीं कि तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो व राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फायर ब्रांड नेता है। वे विरोधियों को बेबाकी व कड़े शब्दों में जवाब देने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन यहां सत्ता के लिए सद्भावना को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। हालांकि अब वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए सरकार के प्रयास की चर्चा होनी चाहिए।

दूसरी तरफ विरोधी दलों ने भी टकराव से बचकर आम लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करने के लिए प्रयास करने होते हैं। ऐसी कुछ ही मिसालें हैं जब चुनाव से पूर्व दो आईपीएस अधिकारियों को डेपूटेशन पर केंद्र में लेना पड़ा है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं व स्वतंत्रता सेनानियों ने कभी नहीं सोचा होगा कि देश में उनकी कुर्बानियां देकर मिली स्वतंत्रता का इस प्रकार अपमान होगा। सरकार बनने से भी ज्यादा आवश्यक यह बात है कि लोगों को उनके वोट के अधिकार का प्रयोग करने के लिए शांतिपूर्ण माहौल दिया जाए। लोकतंत्र की जीत तब होगी जब विकास व मुद्दों पर चर्चा होगी और पार्टी नेता आरोप-प्रत्यारोप को छोड़कर विकास की बात करेंगे। किसी पार्टी को हराने की अपेक्षा जरूरी है समस्याओं को हराना। हिंसा लोकतंत्र के नाम पर कलंक है। सभी दलों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

 

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