राजनीति में धार्मिक पत्ते

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आगामी वर्ष हो रही लोक सभा चुनावों के लिए राजनीतिक पार्टियों में मारोमार इतनी अधिक बढ़ गई है कि धर्मोंं के पत्ते भी अभी से ही प्रयोग में आने शुरु हो गए हैं। खासकर मुस्लमान भाईचारे संबंधी टेढे-मेढ़े ढंग से राजनीति होनी शुरु हो गई है। लगता है राजनेताओं ने मुस्लमानों को सिर्फ वोट ही समझ लिया है। जो तरीका भारत को हथियाने के लिए अंग्रेजों ने अपनाया था, वो ही तरीका आज नेता अपना रहे हैं, समाज को बांटा जा रहा है। चुनावों के नजदीक राजनेताआें की शब्दावली में मुस्लमान शब्द आम हो जाता है।

मुस्लमानों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयास कम व दूसरी पार्टी को मुस्लमानों की विरोधी दिखाने के प्रयास अधिक होते हैं। मुस्लमान अन्य धर्माे के लोगों की तरह ही देश के नागरिक हैं। लेकिन राजनीति में यह बात घर कर गई है कि चुनावों के नजदीक किसी न किसी तरह धार्मिक पत्तों का प्रयोग किया जाए। लगता है राजनेताओं ने बीते से सबक नहीं लिया। साम्प्रदायिकता लम्बे समय तक देश की राजनीति का एक हथियार बनी रही है। राजनीति पार्टियां वोट नीति तक सीमित हो गई हैं। चुनावों से पहले धार्मिक मुद्दे उभारे जाते हैं, जो धार्मिक दंगों का रूप भी धारण कर जाते हैं।

इन दंगों के कारण विश्व स्तर पर देश की साख पर क्लंक लगा, दंगों में भारी जानी व माली नुक्सान हुआ। राजनेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहे। अब भी चुनावों के लिए बयानबाजी को लेकर साम्प्रदायक रंगत दी जा रही है। सीटों का आबंटन तो अंदर खाते पहले ही धर्म-जाति के समीकरण को देखकर किया जाता है ऊपर से बयानबाजी इस रूझान को और खतरनाक बनाती है।

हर पार्टी के एक-दो नेता जहरीले बयान देने के लिए भी मशहूर हैं। बहुत कम मौके हैं जब किसी पार्टी की हाईकमांड ने विवादित बयान के लिए अपने नेता की कलास लगाई हो। अगर ऐसी बयानबाजी प्रति सख्त एक्शन लिया जाता तो कोई भी नेता गलत बयानबाजी देने की हिम्मत नहीं करता। बयान देकर मशहूर होने वालों के खिलाफ सख्ती जरूरी है। समाज में भाईचारे व अमन शांति के लिए सद्भावना बनानी होगी। राजनीतिक पार्टियां विकास के मुद्दों की बात करने व धार्मिक मामलों में सयम से काम लें। इसी में ही देश का भला है। पार्टियां विकास को मुद्दा बनाएं।

 

 

 

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