अन्ना अनशन की घोषणा पर किसानों की चुप्पी

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अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरुद्ध आंदोलन एक विफल आंदोलन रहा है चूंकि तब केन्द्र सरकार ने उन मांगों को पूरा नहीं किया जिन्हें लेकर अनशन किया गया था। उस वक्त बहुत से बुद्धिजीवियों, राजनीतिकों, आमजन ने यह माना था कि अन्ना आंदोलन को अवसरवादी लोगों के हाथों देकर इससे निकल गए या वह अनशन से निराश अलविदा कह गए थे।

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने घोषणा की है कि वह जनवरी के आखिरी दिनों में किसानों के लिए आमरण अनशन पर बैठेंगे। अन्ना हजारे ने ये भी स्पष्ट किया कि ये अनशन उनके जीवन का आखिरी अनशन होगा। अन्ना की घोषणा ने किसानों को कुछ ज्यादा आकर्षित नहीं किया, अन्यथा आंदोलन कर रहे किसान नेता इस पर जरूर कुछ बोलते। इससे पहले अन्ना ने देश में लोकपाल विधेयक लाने एवं भ्रष्टाचार मिटाने के लिए चार अप्रैल से 28 दिसंबर तक 2011 में अपना आमरण अनशन आंदोलन चलाया और प्रसिद्ध रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन से अन्ना हजारे ने पूरे देश को एकजुट किया था, उस वक्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना द्वारा बनाए वातावरण से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ जिसने बादे मे दिल्ली में सरकार बनाई।

अन्ना का भ्रष्टाचार विरुद्ध आंदोलन एक विफल आंदोलन रहा है चूंकि तब केन्द्र सरकार ने उन मांगों को पूरा नहीं किया जिन्हें लेकर अनशन किया गया था। उस वक्त बहुत से बुद्धिजीवियों, राजनीतिकों, आमजन ने यह माना था कि अन्ना आंदोलन को अवसरवादी लोगों के हाथों देकर इससे निकल गए या वह अनशन से निराश अलविदा कह गए थे। वहीं अन्ना हजारे अब किसानों के लिए अनशन की बात कर रहे हैं जिस पर किसी ने कोई जोश या दिलचस्पी नहीं दिखाई है। किसान नेताओं की चुप्पी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि अन्ना को इस लड़ाई में लाकर बैठाना कहीं किसान आंदोलन से ध्यान भटकाना तो नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि अन्ना पहले आंदोलन को हाईजैक करें एवं बाद में किसान बिलों में संशोधन की कुछ शर्तों पर अनशन को पूर्ण कर दें? चूंकि किसान आंदोलन से सरकार को कई बार निराश होना पड़ा है।

सबसे पहले सरकार ने सोचा किसान हफ्ता-दो हफ्ते शोर करेंगे फिर बैठ जाएंगे जोकि नहीं हुआ। फिर सरकार ने आंदोलन को पंजाब के किसानों, खालिस्तानी तत्वों का बताया सरकार का वह दांव भी विफल हुआ। सरकार वार्ता की टेबल पर आई वहां भी अब तक नौ दौर की वार्ता में सरकार को निराशा मिली है। सरकार पर आरोप हैं कि वह पर्दे के पीछे से उच्चतम न्यायलय गई और एक ‘सरकारी’ किसान कमेटी बनवा ली, यहां भी किसानों ने कमेटी के पास न जाने का अपना रूख दर्शाया।

सरकार को तब एक और निराशा हाथ लगी जब कमेटी के सदस्य भूपेन्द्र सिंह मान ने इस्तीफा दे दिया। इतना ही नहीं मुख्य धारा के मीडिया में सरकार के पक्ष की खबरें, सरकार द्वारा किसानों से बातचीत के सरकारी कार्यक्रम सब विफल हो रहे हैं। अब अन्ना हजारे का अनशन पर बैठना किसानों को जरूर अखरेगा कि कहीं ये भी कोई सरकारी चाल तो नहीं? चूंकि ये किसान आंदोलन पिछले चार महीने से चल रहा है, अन्ना हजारे चार महीने तक सरकार को चिट्ठियां लिखकर उनके जवाब का इंतजार क्यों करते रहे?

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