राजनीतिक सुस्ती में सुप्रीम कोर्ट की पहल

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कोविड-19 महामारी में राजनीतिक पार्टियां हाशिए पर पहुंची नजर आ रही हैं। संवेदनशील मुद्दों पर भी केंद्र व राज्य सरकारों में हितों की लड़ाई जारी है लेकिन मानवीय हित में जवाबदेही पर सभी चुप हैं। इन परिस्थितियों में यदि सुप्रीम कोर्ट नोटिस न ले तब सारा ढांचा ही तहस-नहस हो जाए। दिल्ली में कोविड-19 महामारी के कारण मरीजों के शवों के साथ दुर्व्यवहार सरकारों व राजनीतिक पार्टियों की संवेदनहीनता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह कहना कि हम भारतीय क्या मुंह दिखाएँगे, शवों से दुर्व्यवहार करना बेहद चिंताजनक है। केंद्र सरकार के वकील सुप्रीम कोर्ट को बताते हैं कि दिल्ली के कुछ अस्पतालों में शवों को वहां रखा गया, जहां मरीजों का इलाज चल रहा था।

इससे स्पष्ट है कि शव रखे नहीं, बल्कि फेंके गए थे। सरकार का वकील घुमा फिराकर दिल्ली की केजरीवाल सरकार को निशाने पर लाता है लेकिन जब अदालत केंद्र के वकील से पूछती है फिर आपने क्या किया? तब वकील चुप हो जाता है। यदि राज्य सरकार काम नहीं कर रही है तब यह केंद्र सरकार की ड्यूटी है कि अस्पतालों में मानवीय मूल्यों के हो रहे पतन का संज्ञान ले। सरकारों की ड्यूटी जनता की सुरक्षा व संभाल करने की है न कि बयानबाजी करने या शाब्दिक विरोध करने की है।

विरोध करना और कमियां गिनाना विपक्ष की जिम्मेदारी ह,ै लेकिन यहां विपक्ष भी जनता के मुद्दों पर तमाशबीन बना खड़ा है। विपक्ष लोगों की समस्याओं को उठाने में नाकाम साबित हो रहा है। विपक्ष की भूमिका भी अब मीडिया ही निभा रहा है या फिर न्यायपालिका सरकार की कमियों का संज्ञान ले रही है। दिल्ली में सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं होने के बाद तब प्राईवेट अस्पतालों के बिल प्रति मरीज 5-10 हजार रुपये से लाख रुपये तक जाने की रिपोर्टों ने लॉकडाउन की आर्थिक बेहाली से त्रस्त जनता को बेहाल कर दिया है।

सरकारी अस्पतालों में आनलाइन बैड खाली हैं लेकिन मरीजों को उपचार के लिए भर्ती नहीं किया जा रहा। ये सवाल भी केवल मीडिया या न्यायपालिका में ही चर्चा का विषय बने हुए हैं, विपक्ष चुप बैठा है।। इन परिस्थितियों में आम आदमी बीमार होने पर भी किसी को कुछ नहीं बताएगा और स्वस्थ लोगों में बीमारी को फैलाता रहेगा। भले ही देश में कोरोना से पीड़ित मरीजों के ठीक होने की गिनती एक्टिव मरीजों से अधिक है लेकिन रोजाना के नए मरीजों का आंकड़ा 11000 के करीब पहुंचना संकट के गंभीर होने का संकेत हैं। सरकारों को महामारी से निपटने के लिए लोगों में अस्पतालों में हो रही जांच व इलाज के प्रबंधों की विश्वसनीयता पैदा करनी पड़ेगी, अन्यथा लोग मर भले जाएं लेकिन सरकारी अस्पतालों की तरफ शायद मुंह नहीं करेंगे।

 

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