बटवारे का दंश: परिवार के 9 सदस्यों को खोकर पहुंचे थे हिन्दुस्तान

Published On

सच कहूँ/सन्नी कथूरिया
पानीपत। प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई मुहिम के तहत भाजपा ग्रंथालय एवं ई-ग्रंथालय विभाग हरियाणा के प्रांत प्रमुख देवेंद्र दत्ता ने 1947 में भारत की फिरंगियों से आजादी और देश के विभाजन के दंश को झेलने वाली बुजुर्ग आखों से उस भयानक मंजर की दास्तां चौधरी नितिसैन भाटिया से सुनी। भाटिया का जिनका जन्म 5 जुलाई 1939 को पाकिस्तान के गांव नयी बस्ती, जिला मुल्तान में हुआ था।

उनके दादा का नाम चौधरी उधोदास भाटिया एवं दादी का नाम रामो बाई था। चौधरी नितिसैन के पिता का नाम चौधरी रामकिशन भाटिया एवं माता का नाम भगवान देवी था। नितिसैन ने भावुक मन से बताते कहा कि मेरी आयु 8 वर्ष की थी, जब हमारे घर नयी बस्ती में परिवार के लोगों को जिंदा जलाने की खबर आई थी, इस दौरान मेरे परिवार और मेरे चाचा गणेश दास के परिवार की चीखें आज भी मेरी कानों से ओझल नहीं होती। बंटवारे के दंश को जिसने देखा और झेला है वो ही जान सकता है, देश आजाद तो हुआ पर लाखों निर्दोष लोगों का लहू पानी की तरह बहा है।

बड़ी कठिनाइयों से परिवार के सदस्य पहुंचे थे भारत

जीवन के 83वें वर्ष की आयु में पहुंच चुके चौधरी नितिसैन भाटिया ने जब बंटवारें के भयानक मंजर को बयां करना प्रारंभ किया तो नेत्रों में आंसू की धारा बहने लगी। उन्होंने कहा कि हमारे दादा एवं दादी ने हम सब परिवार के 35 लोगों को पहले ही भारत की ओर निकाल दिया था, बाद में दोनों बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए बचते-बचाते भारत पहुंचे थे।

बंटवारे के दौरान परिवार के 9 सदस्य को खोया

भाटिया ने बताया की मुल्तान शहर में दंबगों ने मेरे अपने परिवार के 9 लोगो को जिंदा जला दिया था। मेरी बुआ ईश्वर देवी, मेरे चाचा तेजभान की पत्नी, मेरी चाची उनकी दो बेटियां, मेरा चचेरा भाई दीवान, चाचा गोबिंदराम और अन्य परिवार के सदस्य मिला कर 9 लोगो को जिंदा आग में जला दिया गया था। मेरी बुआ की हत्या के बाद एक वफादार नोकर ने बुआ की लड़की डॉली को बचा कर गांव में छोड़ दिया था।

भारत की फौज नहीं आती तो कोई नहीं बचता

भाटिया ने बताया कि वहां की पुलिस भी पूरी तरह से आतंकियों के साथ मिली हुई थी, यदि वहां भारत की फौज नहीं पहुंचती तो कोई नहीं बचता। उन्होंने बताया की हमारी वहां पर 12000 एकड़ जमीन थी, परिवार में लगभग 200 साल से पीढ़ी दर पीढ़ी खेती की जाती थी, हमारी जमीन पाकिस्तान में रह जाने की एवज में हमें भारत में आ कर केवल 1200 एकड़ जमीन दी गयी थी, उसमें भी परिवार के 8 लोगों का बराबर हिस्सा था। हम 35 लोग पहले हरिद्वार पहुंचे थे, वहां पर लगभग 6 महीने रहने के बाद हम दिल्ली आए, जहां बड़ी मजदूरी करके गुजारा किया। उसके बाद 1951 में जमीन अलॉट हो गई जो की पानीपत के पास उरलाना, पानीपत, बाबरपुर में दी गयी थी। जिसके बाद हम पानीपत आ गए।

अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और TwitterInstagramLinkedIn , YouTube  पर फॉलो करें।

About The Author

Related Posts