राज्य सूचना आयोग बना जनता की जेब पर भारी बोझ!
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सूचना आयोग के मुख्य आयुक्त को 2.50 लाख प्रति माह और आयुक्तों को 2.25 लाख रुपए प्रति माह वेतन व अन्य भत्ते मिलते हैं
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छह सालों में प्रत्येक आरटीआई का निपटान पड़ा 8 हजार 137 रुपए में
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सिर्फ 56 हजार 529 शिकायतों का हुआ निपटान
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20 करोड़ रुपए से ज्यादा वेतन के रूप में हुए खर्च
सच कहूँ/अनिल कक्कड़ चंडीगढ़। 2005 में सूचना का अधिकार आ जाने के बाद जनता के हाथ सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए बहुत बड़ा हथियार आ गया। आरटीआई की मदद से प्रदेश में बहुत बड़े खुलासे हुए और जनता के टैक्स के पैसे की गाढ़ी कमाई के दुरुपयोगों पर नकेल कसी जाने लगी। लेकिन आरटीआई एक्ट को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए बनाए गए राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली इतनी ढीली रही कि आरटीआई का निपटान ही जनता की जेब पर भारी पड़ने लगा है। राज्य सरकार ने जनता के गाढ़े टैक्स की कमाई के करीबन 46.02 करोड़ रुपए पिछले छह सालों में सूचना आयोग पर खर्च किए हैं। वहीं सूचना आयोग ने केवल 56 हजार 529 आरटीआई सूचनाओं का निपटान किया है।
छह सालों में राज्य सूचना आयोग को आबंटित हुए 46.02 करोड़ रुपए
जानकारी के अनुसार 2014 में सत्ता में आते ही भाजपा सरकार ने राज्य सूचना आयोग को और मजबूती प्रदान करने के लिए 2013-14 के 3 करोड़ 85 लाख के बजट के मुकाबले 1.28 करोड़ रुपए बढ़ा कर 5.13 करोड़ रुपए बजट दिया। वहीं सबसे ज्यादा 2019-20 में 9 करोड़ 79 लाख रुपए का बजट राज्य सूचना आयोग को दिया गया है।
वर्ष मुहैया बजट
2014-15 5.13 करोड़ रुपए
2015-16 6.92 करोड़ रुपए
2016-17 6.99 करोड़ रुपए
2017-18 8.44 करोड़ रुपए
2018-19 8.75 करोड़ रुपए
2019-20 9.79 करोड़ रुपए
कुल 46.02 करोड़ रुपए
हर महीने निपटी केवल 785 आरटीआई, आयोग पर खर्च हुए 63.8 लाख रु.
राज्य सूचना आयोग ने पिछले छह सालों में कुल 56 हजार 529 आरटीआई का निपटान किया है। जिसके हिसाब से हर महीने केवल 785 शिकायतों का निपटान हुआ है जबकि 46.2 करोड़ रुपए के हिसाब से हर महीने तकरीबन 63 लाख रुपए राज्य सूचना आयोग का खर्चा है। ऐसे में प्रदेश की जनता के लिए एक आरटीआई का निपटान 8 हजार 137 रुपए में पड़ा है।
3 हजार 792 आरटीआई अभी भी पैंडिंग
हैरानीजनक तथ्य है कि जैसे राज्य सूचना आयोग का बजट और स्टाफ साल-दर-साल बढ़ता गया, वैसे-वैसे आयोग के पास आरटीआई एप्लीकेशन्स की पैंडेंसी भी बढ़ती गई। सबसे ज्यादा 3 हजार 471 आरटीआई की पैंडेंसी 2019 में रही और कमाल बात यह भी रही कि 2019-20 के लिए अब तक का सबसे ज्यादा 9 करोड़ 79 लाख का बजट राज्य सूचना आयोग को मिला।
साल पैंडिंग आरटीआई
2014 1498
2015 1395
2016 1574
2017 1980
2018 2601
2019 3471
2020 (मई तक) 3792
3 करोड़ 27 लाख रुपए जुर्माने के रूप में वसूले
आयोग ने पिछले छह सालों में आरटीआई में कोताही बरतने वाले अधिकारियों एवं अन्यों से 3 करोड़ 27 लाख 59 हजार 490 रुपए जुर्माने के रूप में वसूले। जबकि आयोग ने 50 लाख 28 हजार 100 रुपए मुआवजे के रूप में आरटीआई आवेदनकर्ताओं को भी मुहैया करवाए। वहीं कुल 1 हजार 333 शिकायतों में अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए आयोग ने सिफारिश की।
मुख्य आयुक्त के अलावा सात राज्य सूचना आयुक्त निभा रहे हैं भूमिका
राज्य सूचना आयोग में मुख्य आयुक्त के अलावा सात आयुक्त आयोग की बागडोर संभाले हुए हैं। राज्य सरकार इन आयुक्तों को भारी-भरकम वेतन से नवाज रही है और इनके भत्ते इत्यादि भी प्रदेश के मुख्य सचिव और अतिरिक्त सचिवों के बराबर हैं। मुख्य आयुक्त के लिए 2.50 लाख रुपए प्रति माह वेतन एवं अन्य भत्ते इसके अलावा आयुक्तों के लिए 2.25 लाख रुपए प्रति माह वेतन और अन्य भत्ते इत्यादि फिक्स हैं। वहीं इनके लिए सरकारी सुख-सुविधाओं को पूरा इंतजाम अलग से है। आयुक्तों के अलावा सचिव को 88 हजार 400 रुपए, सीनियर सचिव को 78 हजार 800, अंडर सेक्रेटरी को 67 हजार 700, रिसर्च कम कंसलटैंट को 44 हजार 900, सुपरइंटैडैंट को 44 हजार 900, अकाउंट आफिसर को 44 हजार 900, वहीं सभी आयुक्तों के लिए एक सेके्रटरी जिसे 47 हजार 600 रुपए, प्रोग्रामर को 35 हजार 400 एवं इनके अलावा अन्य असिसटैंट्स, स्टैनो, टाइपिस्ट, रीडर्स, क्लर्क, ड्राइवर, चपरासी इत्यादि हैं, जिनके वेतन हजारों में हैं एवं भत्ते अलग से सरकार द्वारा दिए जाते हैं।
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