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पंजाब में नशा पीड़ितों में 65% से अधिक युवा, विधानसभा समिति की रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
पंजाब में नशे की चपेट में आने वालों में 65% से अधिक युवा
चंडीगढ़ (सच कहूँ/अश्वनी चावला)। Chandigarh News: पंजाब में नशे के खिलाफ सरकार के अभियान के बीच पंजाब विधानसभा की स्वास्थ्य प्रणाली संबंधी समिति की रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एक ओर नशा छुड़ाने के उपचार में इस्तेमाल होने वाली बुप्रेनॉर्फिन दवा की खरीद पिछले चार वर्षोंे में लगभग 57 प्रतिशत बढ़ गई है, वहीं दूसरी ओर नशे की चपेट में आने वाले 65 प्रतिशत लोग 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के युवा हैं। इससे संकेत मिलता है कि पंजाब में नशे की समस्या समाप्त होने के बजाय बड़ी संख्या में युवा लगातार इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं।
सरकारी कार्य संचालन समिति ने सवाल उठाया है कि क्या बुप्रेनॉर्फिन की बढ़ती खपत नशामुक्ति कार्यक्रम की सफलता का संकेत है या फिर मरीज लंबे समय तक इस दवा पर ही निर्भर होते जा रहे हैं। समिति ने पूछा कि क्या यह नशे के उन्मूलन में सरकार की विफलता को नहीं दर्शाता। विधानसभा समिति के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में 7 करोड़ बुप्रेनॉर्फिन गोलियाँ खरीदी गई थीं। यह संख्या 2023 में 9.44 करोड़, 2024 में 10 करोड़ और 2025 में 11 करोड़ तक पहुंच गई। वर्ष 2026 में अब तक 6 करोड़ गोलियों की खरीद हो चुकी है। यह दवा सरकारी ओट क्लीनिकों के माध्यम से नशा छुड़ाने के उपचार में दी जाती है। अधिकारियों ने समिति को बताया कि नशे की आपूर्ति श्रृंखला पर कार्रवाई के बाद ओट क्लीनिकों में मरीजों की संख्या बढ़ी है।
वर्ष 2022 में लगभग 2 लाख मरीज पंजीकृत थे, जो 2026 में बढ़कर करीब 3.17 लाख हो गए हैं। इसी प्रकार सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं को मिलाकर नशामुक्ति उपचार के लिए बेडों की संख्या 2,800 से बढ़ाकर लगभग 5,000 कर दी गई है। मासिक भर्ती भी 600 से बढ़कर 2,800 से 3,400 तक पहुंचने का दावा किया गया है। हालांकि समिति ने इस प्रगति पर संतोष व्यक्त नहीं किया। समिति के सदस्यों ने सवाल उठाया कि यदि मरीज वर्षों तक बुप्रेनॉर्फिन लेते रहते हैं, तो इसे पूर्ण नशामुक्ति कैसे माना जा सकता है। इस पर अधिकारियों ने जवाब दिया कि यह एक दीर्घकालिक चिकित्सीय उपचार है और इसकी कोई निश्चित समय-सीमा नहीं होती। उन्होंने इसकी तुलना मधुमेह जैसी दीर्घकालिक बीमारियों के इलाज से की।
रिपोर्ट के अंत में विधानसभा समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी की हैं। समिति ने अस्पतालों में आॅनलाइन पर्ची प्रणाली, डॉक्टरों द्वारा दवाएँ सॉल्ट नेम से लिखे जाने की सख्त निगरानी तथा नशे के आदी व्यक्तियों को जेल भेजने के बजाय पुनर्वास केन्द्रों में भेजने की नीति अपनाने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि पंजाब में नशे की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पुनर्वास के दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है।
नशामुक्ति केन्द्रों में लगातार बढ़ रही मरीजों की संख्या
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि नशामुक्ति केन्द्रों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन सुविधाएँ उसी अनुपात में उपलब्ध नहीं हैं। लुधियाना सिविल अस्पताल में प्रतिदिन 250 से अधिक मरीज नशामुक्ति उपचार के लिए पहुंचते हैं, जबकि वहाँ केवल 15 बैड ही उपलब्ध हैं। इससे उपचार व्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब की जेलों में संचालित ओट क्लीनिकों में पिछले चार वर्षों के दौरान 40,830 कैदी उपचार के लिए पहुंचे। समिति ने इसे इस बात का संकेत माना कि बड़ी संख्या में नशे के आदी लोग इलाज करवाना चाहते हैं। इसलिए सरकार को केवल कानूनी कार्रवाई पर ही नहीं, बल्कि पुनर्वास पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति पर भी समिति ने जताई चिंता
स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति पर भी समिति ने चिंता व्यक्त की है। पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन के अधीन आने वाली 226 स्वास्थ्य संस्थाओं में से 28 भवन अत्यंत जर्जर और असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें मोहाली जिला अस्पताल तथा जंड साहिब का लगभग 100 वर्ष पुराना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी शामिल हैं, जहाँ तत्काल मरम्मत या नए भवन के निर्माण की आवश्यकता बताई गई है। समिति ने स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत लाखों परिवारों के कार्ड बनने के बावजूद कई सरकारी और निजी अस्पताल मरीजों को उपचार देने से इनकार कर रहे हैं। इसके अलावा डॉक्टरों द्वारा दवाओं के सॉल्ट नेम के बजाय महंगी ब्रांडेड दवाएँ लिखे जाने से आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
