Ambala: कागजों में नियम, हकीकत में अंधेरा, अंबाला के हॉस्टल में बंद कैमरे और टूटी ग्रिल बढ़ा रही चिंता।

Ambala: कागजों में नियम, हकीकत में अंधेरा: अंबाला के हॉस्टल में बंद कैमरे और टूटी ग्रिल बढ़ा रही चिंता।

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Ambala(सच कहूँ न्यूज़)। अंबाला जिला प्रशासन ने बाल देखभाल संस्थानों के लिए पंजीकरण की अनिवार्य शर्त लागू कर दी है। उपायुक्त अजय सिंह तोमर की अध्यक्षता में हुई बुधवार की समीक्षा बैठक में साफ किया गया कि किशोर न्याय अधिनियम-2015 के तहत बिना रजिस्ट्रेशन कोई भी संस्था चाहे वह धार्मिक हो या एनजीओ, बच्चों को आश्रय नहीं दे पाएगी। जिला बाल संरक्षण अधिकारी ममता रानी ने इसे कानूनी रूप से दंडनीय अपराध बताते हुए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। प्रशासन का यह कदम कागजों पर बेहद सुदृढ़ नजर आता है, लेकिन हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि असली चुनौती रजिस्ट्रेशन नहीं, बल्कि रेगुलेशन है।

 इस सरकारी कवायद के बीच उगाला स्थित एक एकेडमी का मामला व्यवस्था की सतर्कता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहाँ से 4 से 9 साल की तीन बच्चियां रात के अंधेरे में खिड़की की ग्रिल तोड़कर भाग निकली थीं। जोकि बदहवास हालत में रोड़ किनारे उगाला के पंच संजीव को यह केवल एक पलायन नहीं था, बल्कि उन सुरक्षा दावों की नाकामी थी जिन्हें प्रशासन अनिवार्य बता रहा है। डीएसपी बराडा सुरेश कौशिक की जांच में जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले हैं। जांच के दौरान संस्थान के सीसीटीवी कैमरे बंद पाए गए। जब सुरक्षा की पहली दीवार यानी तकनीकी निगरानी ही ऑफ हो, तो वहां रहने वाले बच्चों की सुरक्षा केवल प्रबंधन की दया पर निर्भर रह जाती है।

 भूखा रखने और प्रताड़ना के आरोप

             जांच में केवल बंद कैमरे ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्रशासनिक अनियमितताएं भी पाई गई हैं। सवाल यह उठता है कि जिस संस्थान में मासूम बच्चियां शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगा रही हों, वहां पंजीकरण की औपचारिकता क्या वास्तव में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगी? कानून के अनुसार संस्थानों को बच्चों के लिए घर जैसा माहौल देना चाहिए, लेकिन ग्रिल तोड़कर भागने की मजबूरी कुछ और ही कहानी बयां करती है। क्षेत्र में यह सवाल भी गूंज रहा है कि डीएसपी की रिपोर्ट में अनियमितताएं उजागर होने के बाद अब तक संस्थान पर क्या ठोस कार्रवाई हुई है?

          बाल कल्याण समिति की स्टेट चेयरपर्सन रंजीता मेहता ने इस पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, हमने उन तीनों बच्चियों की काउंसलिंग की थी, उस समय बच्चियों का हॉस्टल में मन नहीं लग रहा था। हम समय-समय पर औचक निरीक्षण और छापामार कार्रवाई करके वास्तविकता की जांच करते हैं। बच्चों की सुरक्षा के लिए हमारा विभाग पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

             मेहता का यह बयान आश्वासन तो देता है, लेकिन छापामार कार्रवाई और वास्तविकता की जांच जैसे शब्दों की असली परीक्षा तब होगी, जब भविष्य में अंबाला का कोई भी बाल गृह बंद कैमरों और टूटी ग्रिलों की सुर्खियों से मुक्त होगा। फिलहाल, प्रशासन के सामने चुनौती केवल पंजीकरण की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उन बंद कैमरों के पीछे छिपी अनियमितताओं को स्थायी रूप से बंद करना है।

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