Stubble Business: पराली से पैलेट्स बनाकर सालाना 7 से 8 करोड़ रुपए का कारोबार कर रहीं संजना व सोनिका
अढ़ाई करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2024 में स्थापित की फैक्ट्री
Stubble Management and Employment: सरसा, (सच कहूँ न्यूज)। खेतों में फसल अवशेष जलने से उठने वाला धुआं कभी पर्यावरण और आमजन के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनता था, लेकिन अब यही पराली रोजगार और कमाई का जरिया बन रही है। सरसा जिले के गांव घोड़ावाली निवासी संजना व सोनिका ने पराली की समस्या का समाधान तलाशते हुए वर्ष 2024 में फैक्ट्री स्थापित की। यहां धान की पराली से पैलेट्स तैयार किए जाते हैं, जिन्हें बिजली संयंत्रों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। करीब ढाई करोड़ रुपये की लागत से स्थापित इस परियोजना को कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) योजना के माध्यम से पूरा किया गया। आज इस फैक्ट्री का सालाना कारोबार 7 से 8 करोड़ रुपए तक है। दो महिला साझेदार मिलकर इस इकाई का संचालन कर रही हैं।
सालाना डेढ़ लाख क्विंटल तक पराली की खपत
फैक्ट्री में पैलेट्स तैयार करने के लिए सरसा और आसपास के क्षेत्रों में काम करने वाले बेलर संचालकों से पराली खरीदी जाती है। इस इकाई में हर साल करीब एक से डेढ़ लाख क्विंटल पराली की खपत होती है। धान की कटाई के सीजन में एकत्र की गई पराली का भंडारण करके उससे पूरे साल उत्पादन जारी रखा जाता है। इससे फसल अवशेष का उपयोगी उत्पाद तैयार होता है और पराली के प्रबंधन के लिए एक व्यावहारिक विकल्प भी मिलता है। फैक्ट्री में तैयार पैलेट्स बिजली संयंत्रों द्वारा खरीदे जाते हैं, जिससे उत्पाद के लिए बाजार उपलब्ध है।
20 से अधिक लोगों को मिला रोजगार
पराली से पैलेट्स बनाने वाली इस फैक्ट्री ने कारोबार के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं। यहां 20 से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यह पहल बताती है कि कृषि अवशेषों का उचित प्रबंधन केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है। पराली को खेतों में जलाने के बजाय उपयोगी उत्पाद में बदलने से किसानों, बेलर संचालकों और उद्योगों के बीच आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
धुएं की परेशानी से निकला समाधान का रास्ता
सोनिका ने बताया कि कुछ साल पहले धान की कटाई के बाद आसमान में चारों तरफ धुआं दिखाई देता था। पराली जलाने से होने वाली परेशानी को देखते हुए उन्होंने इसके समाधान की दिशा में प्रयास शुरू किए। उनका उद्देश्य पराली का ऐसा उपयोग तलाशना था, जिससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के साथ आर्थिक लाभ भी हासिल किया जा सके। उन्होंने कहा कि वे पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी तरफ से जितना योगदान दे सकती हैं, उतना देने का प्रयास कर रही हैं। सोनिका के अनुसार, सरकार की नीतियों और पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने के प्रयासों से स्थिति में बदलाव आया है।