गुमशुदा आशिक मोहम्मद को उसके परिवार से मिलाकर संगरिया के सेवादारों ने लौटाई घर की रौनक
डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों ने बिछुड़े बेटे को अपनों से मिलवाया
संगरिया (सच कहूँ/सुरेन्द्र जग्गा)। डेरा सच्चा सौदा द्वारा शुरू किए गए मानवता भलाई के कार्य मंदबुद्धि लोगों के लिए राहत का पैगाम बन गए हैं। शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर कमेटी के तत्वावधान में किए जाने वाले 175 मानवता भलाई कार्यों के तहत स्थानीय ब्लॉक के सेवादारों ने उत्तर प्रदेश से 5 माह से लापता हुए लगभग 33 वर्षीय युवक को संगरिया पुलिस की मौजूदगी में परिजनों के सपुर्द कर दिया। Sangaria News
उत्तरप्रदेश के सुलतानपुर के एक छोटे से घर में पिछले पांच महीनों से चूल्हा तो जलता था, पर भूख मर चुकी थी। आशिक मोहम्मद के जाते ही उस घर की रौनक जैसे कहीं दफन हो गई थी। एक बूढ़ी माँ जिसकी आँखें दरवाजे की चौखट को ताकते-ताकते पथरा गई थीं, एक पत्नी जिसका दिल पति के बिछड़ने के सदमे से कमजोर पड़ चुका था, और वो बेटियां जो अपने पिता के साये के लिए हर पल तरसती थीं। इस मौके पर मौजूद भाजपा के जिला संयोजक पारस मिढ़ा व सेवा भारती समिति अध्यक्ष सतीश नागपाल ने कहा कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और संगरिया के इन सेवादारों ने इसे चरितार्थ कर दिखाया है।
डेरा सच्चा सौदा द्वारा चलाए जा रहे ये मानवता भलाई के कार्य समाज में प्रेम व भाईचारे की जड़ों को मजबूत करते हैं। इस पुनित कार्य में मुख्य रूप से शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर कमेटी के जिम्मेवार भाई लालचंद इन्सां, संगरिया ब्लाक के प्रेमी सेवक ओम प्रकाश इन्सां अमराराम इन्सां, सुखदेव इन्सां, संदीप बाघला इन्सां पवन इन्सां जंडवाला विजय चुघ इन्सां सच्ची प्रेमी समिति सेवादार लवली गर्ग इन्सां, रॉकी गर्ग इन्सां प्रबल गोयल इन्सां, गुरचरण इन्सां,सुरजीत खोसा इन्सां, महेश गोयल इन्सां बलजीत खोसा इन्सां सुभाष गोदारा इन्सां अमरनाथ पेंटर व सुरेंद्र जग्गा इन्सां का सहयोग रहा। फरिश्ते बनकर आए सेवादार जब सारी उम्मीदें दम तोड़ रही थीं, तब राजस्थान की तपती सड़कों पर भटकते हुए एक बेबस इंसान पर संगरिया के सेवादारों की नजर पड़ी।
वो इंसान जो अपना नाम तक भूल चुका था, उसे इन सेवादारों ने न केवल नाम दिया, बल्कि एक नई जिंदगी भी दी। गंदे कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी और उलझे हुए बालों के पीछे छिपे उस बेबस पिता को अपनों से मिलाने की जो कसम 'शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर कमेटी के जवानों ने खाई, उसने आज एक चमत्कार कर दिखाया। वो मंजर, जब पत्थर भी पिघल गए संगरिया थाने का वो नजारा कलेजा चीर देने वाला था। पांच महीने बाद जब पिता लाल मोहम्मद ने अपने 'जिगर के टुकड़े' को देखा, तो शब्द मौन हो गए और बस आँखों से बेसाख्ता आंसू बह निकले। वो आंसू उन रातों का हिसाब थे जो परिवार ने जागकर काटी थीं। भाई मोहम्मद कैफ का गला रुंध गया, जब उसने अपने भाई को सुरक्षित पाया। आज एक बार फिर साबित हुआ कि मजहब और सरहदों से ऊपर 'इंसानियत' का धर्म सबसे बड़ा है। Sangaria News
