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लीची की मिठास पर मौत का साया! जाल में फंसकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे बेजुबान पक्षी
लीची की मिठास पर मौत का साया! जाल में फंसकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे बेजुबान पक्षी
मीरापुर।(सच कहूं/कोमल प्रजापति) क्षेत्र के लीची बागों में फलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए जाल अब बेजुबान पक्षियों के लिए मौत का जाल साबित हो रहे हैं। हर साल बड़ी संख्या में पक्षी इन जालों में फंसकर अपनी जान गंवा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब भी मूकदर्शक बने हुए हैं। क्षेत्र के भुम्मा, चुड़ियाला, संभलहेड़ा, मुझेडा टोल प्लाजा के आसपास, कुतुबपुर, खेड़ी सराय सहित कई गांवों में स्थित लीची बागों को ठेकेदारों द्वारा पूरी तरह जालों से ढक दिया गया है। इन जालों का उद्देश्य फलों को पक्षियों से बचाना है, लेकिन यही जाल अनेक पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि भोजन की तलाश में आने वाले पक्षी दिन और रात के समय इन जालों में उलझ जाते हैं। बाहर निकलने की कोशिश में वे घंटों तक तड़पते रहते हैं और अंततः दम तोड़ देते हैं। कई बार सुबह के समय जालों में मृत पक्षी लटके हुए दिखाई देते हैं, जो एक बेहद दुखद दृश्य होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह समस्या नई नहीं है। पिछले वर्षों में भी सैकड़ों पक्षियों की इसी तरह मौत हुई थी, लेकिन न तो वन विभाग ने कोई ठोस कदम उठाया और न ही प्रशासन ने इस ओर गंभीरता दिखाई। लोगों का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी केवल आश्वासन देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।
वन्य जीव प्रेमियों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि पक्षी प्रकृति की अमूल्य धरोहर हैं और उनकी इस तरह हो रही मौतें बेहद चिंताजनक हैं। उनका मानना है कि फलों की सुरक्षा के लिए ऐसे घातक जालों की बजाय सुरक्षित और वैज्ञानिक विकल्प अपनाए जाने चाहिए, जिससे न तो किसानों को नुकसान हो और न ही पक्षियों का जीवन खतरे में पड़े।
क्षेत्रवासियों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि लीची बागों में लगाए गए जालों की तत्काल जांच कराई जाए तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही ऐसे उपाय सुनिश्चित किए जाएं, जिनसे फसल भी सुरक्षित रहे और बेजुबान पक्षियों का जीवन भी बचाया जा सके।
"क्या फलों की सुरक्षा के नाम पर पक्षियों की बलि देना उचित है?"
यह सवाल अब क्षेत्र के लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में पक्षियों की कई प्रजातियों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।