एआई से कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार : डॉ. जितेंद्र सिंह

एआई से कृषि अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार : डॉ. जितेंद्र सिंह

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नई दिल्ली। नई दिल्ली। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने बुधवार को कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में कई गुना वृद्धि की क्षमता रखती है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने यहां 17वें कृषि नेतृत्व सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुए कहा कि डिजिटल प्रौद्योगिकियां कृषि क्षेत्र को पारंपरिक ढांचे से निकालकर उच्च विकास वाले क्षेत्र में बदल रही हैं। उन्होंने किसानों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, ड्रोन, उपग्रह आधारित सेवाओं और मौसम पूवार्नुमान जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया। उनके अनुसार इन तकनीकों के माध्यम से किसान बुआई, सिंचाई, फसल प्रबंधन और संसाधनों के बेहतर उपयोग से उत्पादन बढ़ाने के साथ लागत भी कम कर सकते हैं।

उन्होंने अनुमान जताया कि एआई आधारित तकनीकों के व्यापक उपयोग से देश की कृषि अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य सृजित किया जा सकता है। उन्होंने कृषि स्टार्टअप्स को भारत के कृषि भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण ताकत बताते हुए कहा कि स्टार्टअप क्रांति की अगली लहर खेतों से निकलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम पिछले एक दशक में तेजी से विकसित हुआ है और अब इसकी वास्तविक क्षमता कृषि क्षेत्र में दिखाई दे सकती है। उन्होंने कहा कि कृषि केवल खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उद्यमिता, रोजगार और ग्रामीण समृद्धि का सबसे बड़ा आधार बन सकती है। उन्होंने इस धारणा को बदलने की जरूरत बताई कि स्टार्टअप केवल सूचना प्रौद्योगिकी या महानगरों तक सीमित हैं। उनके अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावहारिक ज्ञान और नवाचार की क्षमता कृषि आधारित उद्यमों को नयी ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। डॉ. सिंह ने वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के अरोमा मिशन का उदाहरण देते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर में शुरू हुई लैवेंडर की खेती आज "बैंगनी क्रांति" का रूप ले चुकी है। इससे 8 से 9 हजार युवा कृषि उद्यमी तैयार हुए हैं, जिनमें कई की वार्षिक आय 60 से 70 लाख रुपये या उससे अधिक पहुंच गयी है। उन्होंने कहा कि इस मॉडल को उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड सहित कई राज्यों ने अपनाया है, जो विज्ञान आधारित कृषि उद्यमिता की सफलता का प्रमाण है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे में उपग्रह प्रौद्योगिकी, सटीक मौसम पूवार्नुमान, संसाधन मानचित्रण और ड्रोन आधारित सर्वेक्षण किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फसल प्रबंधन, स्मार्ट सिंचाई और मौसम आधारित सलाह से प्रत्येक किसान को सालाना लगभग 5 हजार रुपये तक की बचत हो सकती है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर कृषि क्षेत्र में लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त मूल्य जुड़ सकता है।

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